युवा भारत की चुनौती बन गई है बेरोजगारी
एक्टिविस्ट
भारत को दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में गिना जाता है, लेकिन यही युवा शक्ति आज बेरोजगारी की गंभीर चुनौती से जूझ रही है। देश के बड़े शहरों की चमकदार सड़कों से लेकर छोटे कस्बों और तंग गलियों तक, काम की तलाश में भटकते युवा मिल जाएंगे। यह स्थिति केवल आर्थिक चिंता नहीं है, बल्कि सामाजिक असंतुलन और भविष्य की अनिश्चितता का संकेत भी है। बेरोजगारी का सवाल अब व्यक्तिगत समस्या से बढ़कर राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बन चुका है।
राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध आंकड़े इस संकट की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। विभिन्न श्रम सर्वेक्षणों और आर्थिक आकलनों के अनुसार, भारत में बेरोजगारी दर पिछले कुछ वर्षों में सात से आठ प्रतिशत तक चली गई है, जबकि 15 से 29 आयु वर्ग के युवाओं में यह दर 15 से 20 प्रतिशत तक पहुंच रही है। राज्य स्तर पर स्थिति और भी चिंताजनक दिखाई देती है। राजस्थान, बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में युवा बेरोजगारी दर कई बार 20-25 प्रतिशत के आसपास तक दर्ज की गई है। यह अंतर बताता है कि क्षेत्रीय असमानताएं इस समस्या को और गहरा बना रही हैं।
बेरोजगारी को अक्सर केवल नौकरियों की कमी के रूप में देखा जाता है, लेकिन वास्तव में यह एक बहुआयामी समस्या है। इसमें शिक्षा व्यवस्था की खामियां, कौशल और उद्योग की जरूरतों के बीच असंतुलन, भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी और सामाजिक-आर्थिक विषमताएं शामिल हैं। देश में हर साल लाखों युवा डिग्री लेकर निकलते हैं, लेकिन उनमें से एक बड़ा हिस्सा रोजगार के लिए आवश्यक व्यावहारिक कौशल से वंचित होता है। विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत में केवल 40-50 प्रतिशत स्नातक ही ‘रोज़गार योग्य’ माने जाते हैं। यह स्थिति बताती है कि भारत की शिक्षा प्रणाली अभी भी रोजगार के अनुरूप खुद को ढालने में पीछे है।
इसके साथ ही, बेरोजगारी का एक बड़ा कारण अवसरों का असमान वितरण भी है। शहरी क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसर सीमित और प्रतिस्पर्धा अत्यधिक है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। छोटे शहरों और बस्तियों में रहने वाले युवाओं के पास न तो पर्याप्त संसाधन होते हैं और न ही मार्गदर्शन, जिसके कारण वे मुख्यधारा की प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते हैं। आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए महंगी कोचिंग, उच्च शिक्षा और नेटवर्किंग के अवसर लगभग पहुंच से बाहर होते हैं, जिससे उनकी प्रतिभा दबकर रह जाती है।
इस संकट के बीच एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति स्वरोजगार और कौशल आधारित कार्यों की ओर झुकाव के रूप में उभर रही है। जब औपचारिक रोजगार के अवसर सीमित होते हैं, तब लोग अपने स्तर पर छोटे व्यवसाय, हस्तशिल्प, सेवा कार्य और घरेलू उद्योगों के माध्यम से आजीविका के रास्ते तलाशते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देती है, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन का माध्यम भी बन सकती है। इसके बावजूद, स्वरोज़गार को अभी भी पर्याप्त संस्थागत समर्थन नहीं मिल पा रहा है।
महिलाओं की स्थिति इस संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भारत में महिला श्रम भागीदारी दर अभी भी लगभग 25 से 30 प्रतिशत के बीच है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है। सामाजिक बंधन, सुरक्षा की चिंता और घरेलू जिम्मेदारियां महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को सीमित करती हैं। यदि उन्हें कौशल प्रशिक्षण, सुरक्षित कार्य वातावरण और लचीले रोजगार के अवसर मिलें, तो वे न केवल अपनी आर्थिक स्थिति सुधार सकती हैं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर सकती हैं। (यह लेखक के निजी विचार हैं)
