अद्वैतभाव का व्यक्त स्वरूप रासलीला

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
On

रासलीला एक दिव्य प्रेम सुधा रस का समुद्र है। उसकी दो धाराएं हैं। दो ओर से आती हैं। टकराती हैं और एक हो जाती हैं। पहली लहर दूसरी हो जाती है। दूसरी लहर पहली हो जाती है। इस प्रकार प्रेमी-प्रियतम, प्रियतम-प्रेमी के अन्यतम मिलन की यह अनंत धारा चलती रहती है। नया मिलन, नया रूप, नया रस, नई प्सास और नई तृप्ति। यही प्रेम रस का अद्वैत स्वरूप है। इसी का नाम रास है। एक कृष्ण, एक वृत्ति की अद्वैत रसभावना से ओत-प्रोत हृदय के रंगमंच पर संधिस्थानीय श्याम-ब्रह्म और तदाकार-वृत्तियों की धारा के रूप में गोपियों का नृत्य ही रासलीला है।

रास में साहित्य, संगीत और कला (नृत्य) का समन्वय होता है। सत्यं शिवम सुंदरम् की यही पहचान है। इस रासलीला में काम (वासना) अंशमात्र भी नहीं है। देव, गंधर्व, किन्नर तथा नारद आदि भी आकाश से एवं श्रीमहादेव जी ने स्वयं गोपी बनकर गोपीश्वर महादेव के रूप में वंशीवट पर वृंदावन में रासलीला में प्रवेश कर महारास को अपने तीनों नेत्रों से निहारा करते हैं। आज भी श्रीगोपेश्वर महादेव के रूप में निहार रहे हैं।-डॉ.  प्रदीप द्विवेदी ‘रमण’ आध्यात्मिक लेखक


एक बात स्पष्ट समझ लेनी चाहिए कि रासलीला में गोपी के शरीर के साथ कोई लेना-देना नहीं है। यह साधारण स्त्री व पुरुष का नहीं, जीव और ब्रह्म का मिलन है। शुद्ध जीव का ब्रह्म के साथ विलास ही रास है। शुद्ध जीव का अर्थ है- माया के आवरण से रहित जीव। ऐसे जीव का ही ब्रह्म से मिलन होता है। इसीलिए गोपियों के साथ श्रीकृष्ण ने महारास से पूर्व चीरहरण लीला की थी। चीरहरण लीला में जब बाहरी आवरण उपाधि नष्ट हुई तो रासलीला हुई। जीव और ब्रह्म का तादात्म्य हुआ। जिस प्रकार वस्त्र देह ढकता है, उसी प्रकार वासना और अज्ञान आत्मा को ढक देते हैं और परमात्मा को दूर करते हैं। जब तक अज्ञान और वासना का आच्छादन दूर नहीं हो जाता, तब तक शिव से मिलन नहीं हो पाता। वस्त्र हरण लीला बुद्धिगत वासना, बुद्धिगत अज्ञान को उड़ा ले जाने की लीला है। वासना और अज्ञान रूपी वस्त्र प्रभु मिलन में बाधक हैं। इन्द्रियों के काम को हटाना सरल है, किंतु बुद्धिगत काम को निकाल बाहर करना बड़ा कठिन है। श्रीकृष्ण ने गोपियों के वासना रूपी आवरण को हटा दिया। शुद्ध-बुद्ध गोपियों के साथ महारस किया।

श्रीधरस्वामी के अनुसार पंच्चाध्यायी (भागवत में रास के 5 अध्याय) रासलीला निवृत्ति धर्म का परम फल है। रासलीला के 5 अध्याय पंच प्राणों के सूचक प्रतीत होते हैं। पंच प्राणों का ईश्वर के साथ रमण ही रास है। वेणुगीत की बांसुरी तो केवल पशु-पक्षियों को ही नहीं सबको सुनाई देती है। किंतु रासलीला की बांसुरी तो ईश्वर से मिलनातुर अधिकारी जीव गोपी को ही सुनाई देती है। 

रासलीला कोई साधारण स्त्री की नहीं, देह-मान भूली हुई, देहाध्यास से मुक्त स्त्री की कथा है। देहाध्यास नष्ट होने पर प्रभु की चिन्मयी लीला में प्रवेश मिलता है। अंतर्मुखी दृष्टि करके जीव जब भगवान के पास पहुंचता है, तब वे पूछते हैं- मेरे पास क्यों आया है? गोपियों से भी पूछा था- मेरे पास क्यों आई हो? पति सेवा तथा संतान सेवा करो, रात्रि में मिलन उचित नहीं। जीव को परमात्मा सहज नहीं मिलते हैं। जीव को भ्रांति होती है। संसार में रत रहो, वहीं तुमको सुख मिलेगा। मै सुख नहीं, केवल आनंद ही दे सकता हूं।

ब्रह्म जीव को संसार में लौटाता है, प्रलोभन देता है। माया जाल में फंसाता है। नटवर नागर श्रीकृष्ण के इतना कहने पर गोपियां कहती हैं- ‘पादौ पदं न चलतस्तव पादमूलाद यामः कथं व्रजमधो करवाम किं वा।। (श्रीमदभागवत 10/29/34)। अर्थात हे गोविन्द! हमारे पांव आपके चरण कमलों को छोड़कर एक पग भी पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। हम ब्रज को लौटें तो कैसे? और यदि हम लौटें भी तो मन के बिना वहां हम क्या करें? हमारा मन आप में ही रमा हुआ है। हम भी आपके स्वरूप से तदाकार होना चाहती हैं। प्रभु ने सोचा कि इन गोपियों का प्रेम सच्चा है। जीव शुद्ध भाव से मुझसे मिलने आया है, तो उसे अपना लिया। श्रीकृष्ण ने एक साथ अनेक स्वरूप धारण किए। जितनी गोपियां थीं, उतने स्वरूप बना लिए और प्रत्येक गोपी के साथ एक-एक स्वरूप रखकर रासलीला आरंभ की। हजारों जन्मों का विरही जीव आज प्रभु के सम्मुख उपस्थित हो सका है। जीव आज ईश्वरमय हो गया। वे दोनों एक हो गए। इस मिलन से जीव और ईश्वर दोनों को अति आनंद हुआ। गोपियां श्रीकृष्णमय तथा भगवन्मय हो गईं। सभी हाथों से हाथ मिलाकर नृत्य करने लगीं। यह तो ब्रह्म से जीव का मिलन हुआ है। इस प्रकार अद्वैत सिद्धांत के आचार्य श्रीशुकदेवजी ने रासलीला में अद्वैत का वर्णन किया है। 

महारास देखते-देखते ब्रह्माजी सोचने लगे कि कृष्ण और गोपियां निष्काम तो हैं, फिर भी देहभान भूलकर इस प्रकार पराई नारी से लीला करना शास्त्र मर्यादा का उल्लंघन ही है। ब्रह्माजी सशंकित हुए। ब्रह्माजी यह नहीं जानते थे कि यह रासलीला धर्म नहीं धर्म का फल है। श्रीकृष्ण ने एक और खेल रचा- उन्होंने सभी गोपियों को अपना स्वरूप दे दिया। अब तो सर्वत्र कृष्ण ही कृष्ण दिखाई दे रहे थे। गोपियां थी ही नहीं। सभी पीतांबरी कृष्ण हैं और एक दूसरे से रास खेल रहे हैं। ब्रह्माजी ने मान लिया कि यह स्त्री-पुरूष का मिलन नहीं है। श्रीकृष्ण गोपीरूप हो गए हैं। ब्रह्माजी ने श्रीकृष्ण को साष्टांग प्रणाम किया। यह विजातीय तत्व का स्त्रीत्व और पुरुषत्व का मिलन नहीं अंश और अंशी का मिलन है। गोपियां श्रीकृष्णमय हो गईं, प्रभुरूप बन गईं। ब्रह्मरूप हो जाने के बाद जीव का स्वत्व कहां रहा?

शास्त्र कहता है कि श्रीकृष्णस्तु भगवान स्वयं। तब यह बात अपने आप स्पष्ट हो जाती है कि कृष्ण कामी नहीं, भोगी नहीं, बल्कि निष्काम कर्म के अधिष्ठाता एवं स्वयं योगेश्वर हैं। जिस प्रकार उन्होंने ब्रह्माजी का गर्व गो-वत्स हरण लीला करके, अग्नि का गर्व दावानल पान लीला करके और इन्द्र का गर्व गोवर्धन धारण लीला करके नष्ट किया, उसी प्रकार उन्होंने रासलीला करके कामदेव का गर्व भी नष्ट किया। इन लीला प्रसंगों में यह बात स्पष्ट हो जाती है कि रासलीला महालीला है। अद्वैतभाव का व्यक्त स्वरूप है। अंश का अंशी में परम मिलन है। भेदबुद्धि रूप लौकिक दृष्टि का निरसन कर अभेदबुद्धि रूप आध्यात्मिक यथार्थ तत्व का महिमामंडित स्वरूप है।