इलाज में सहायक मस्तिष्क कोशिकाओं की आणविक क्रियाएं की समझ

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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आसां नहीं है दर्द को दूर करना। बिछुड़ने के गम और कारोबारी घाटे से अथवा चोट या घाव लगने के दर्द की न्यूरो-फिजियोलॉजी को समझना आसान बिलकुल नहीं है। आयुर्वेद और भारत की लोकचिकित्सा में बहुत से दर्द निवारक तो बताये गए हैं, लेकिन अवसाद और इससे पैदा दर्द की मॉलिक्यूलर बायोलॉजी बिलकुल अलग है। मध्यकाल में युद्धों के दौरान लगे घावों से पैदा दर्द के अहसास को दूर करने के लिए योद्धा लोग अक्सर अफीम को साथ रखते थे ताकि वे इसकी कुछ मात्रा के सेवन एक दवा के रूप में कर सकें। इनकी फार्माकोलॉजी और रासायनिक एवं इनके एक्टिंग मैकेनिज्म पर भी बहुत काम हुआ है। लोगों को अफीम के बारे में अमूमन मालूमात हैं जो एक दर्द निवारक नशीला पदार्थ है। 

शरीर विज्ञानियों ने शरीर के भीतर ही छिपे हुए कुदरती दर्दनिवारकों (बॉडीज ऑन नेचुरल ऑपिओइड्स) का पता लगाया है। इन सबको एन्टागोनिस्ट कहा जाता है जो मॉडर्न फार्माकोलॉजी की एक टर्म है। बात अफीमचियों द्वारा नशे के रूप में अफीम का सेवन करने की यह नहीं है। मॉडर्न क्लिनिकल फार्माकोलॉजी एक और विधा है जिसमें दवा के असर को जीवों में देखा जाता है। सभी जीव इन कुदरती या शरीर द्वारा बनाए गए दर्द निवारकों को सिंथेसायिज़ करके लैब में बनाकर देखा जाता और फार्मूला सिद्ध होने के बाद इसे ड्रग इंडस्ट्री द्वारा बड़े स्तर पर एक प्रोडक्ट या दवा के रूप में उपलब्ध कराया जा सकता है। गोली या पेय के प्रति सभी लोग एक जैसी प्रतिक्रिया नहीं देते।

दर्द निवारक की अधिक मात्रा, जैसे कि एस्पिरिन में मौजूद एक्टिव पुनर्प्राप्त रसायन एसिटिल सैलीसाइलिक एसिड जिसे सैलीसाइलिक एसिड से हासिल किया जाता है। इसके मॉलिक्यूल प्रोस्टाग्लैंडीन के स्राव को रोकते हैं जो कि दर्द की अनुभूति के लिए एक मध्यस्थ कुदरती द्रव है। प्रोस्टाग्लैंडिन लिपिड यौगिक होते हैं जो ऊतक क्षति या संक्रमण वाले स्थानों पर स्थानीय रूप से उत्पन्न होते हैं। ये रासायनिक संदेशवाहक के रूप में कार्य करते हैं और सूजन, रक्त प्रवाह और प्रजनन जैसी शारीरिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करते हैं। पारंपरिक हार्मोनों के विपरीत, प्रोस्टाग्लैंडिन आवश्यकता पड़ने पर शरीर में संश्लेषित होते हैं और आमतौर पर अपने उत्पादन स्थल के निकट ही कार्य करते हैं, साथ ही इनका अर्द्ध-जीवनकाल बहुत कम होता है। -रणवीर सिंह फोगाट

एस्पिरिन के काम करने के तरीके में साइक्लोऑक्सीजिनेज एंजाइमों, खास तौर पर साइक्लोऑक्सीजिनेज-1 और साइक्लोऑक्सीजिनेज-2 को हमेशा के लिए रोकना शामिल है। यह रुकावट एराकिडोनिक एसिड को प्रोस्टाग्लैंडीन और थ्रोम्बोक्सेन में बदलने से रोकती है। ये दोनों कई शारीरिक प्रक्रियाओं में शामिल होते हैं। साइक्लोऑक्सीजिनेज-1 के एक्टिव हिस्से में मौजूद एक सेरीन अवशेष को एसिटाइलेट करके, एस्पिरिन प्लेटलेट्स में थ्रोम्बोक्सेन ए-2 के बनने को रोक देती है, जिससे प्लेटलेट्स का जमा होना और खून के थक्के बनना कम हो जाता है। इसलिए हृदयाघात से पीड़ितों को एस्पिरिन की मामूली सी मात्रा नियमित तौर से लेने की सलाह दी जाती है। यह हमेशा रहने वाला असर प्लेटलेट की 7 से 10 दिनों तक की ज़िंदगी तक बना रहता है। 

एस्पिरिन द्वारा साइक्लोऑक्सीजिनेज-13 को रोकने की वजह से ही इसमें सूजन-रोधी, दर्द-निवारक और बुखार-रोधी गुण भी होते हैं। कम मात्रा में लेने पर, एस्पिरिन मुख्य रूप से प्लेटलेट्स में मौजूद साइक्लोऑक्सीजिनेज-1 पर असर डालती है, जिससे दिल की बीमारियों से सुरक्षा मिलती है लेकिन ज़्यादा मात्रा में लेने पर, यह साइक्लोऑक्सीजिनेज-2 को भी रोकती है, जिससे इसके सूजन-रोधी और दर्द-निवारक असर और भी बढ़ जाते हैं।

प्रख्यात विज्ञान पत्रिका साइंस में छपी एक स्टडी के मुताबिक, साइंटिस्ट्स ने ब्रेन की एक ऐसी प्रक्रिया को मामूम किया है जिससे मालूम होता है कि कुछ लोगों में क्रोनिक दर्द से डिप्रेशन क्यों होता है, लेकिन दूसरों में नहीं। ये नतीजे इस सोच को चुनौती देते हैं कि लंबे समय तक दर्द से डिप्रेशन होना तय है। जानवरों पर स्टडी के साथ-साथ इंसानों में बड़े पैमाने पर ब्रेन इमेजिंग का इस्तेमाल करके, टीम ने पाया कि लगातार दर्द हिप्पोकैम्पस में धीरे-धीरे बदलाव लाता है। यह ब्रेन का एक हिस्सा जो याददाश्त में अपनी भूमिका के लिए सबसे ज़्यादा जाना जाता है। ये बदलाव इस बात पर असर डालते हैं कि कोई व्यक्ति समय के साथ डिप्रेशन में जाता है या इमोशनली मज़बूत रहता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ वारविक के प्रोफेसर जियानफेंग फेंग ने बताया है कि क्रोनिक दर्द अक्सर डिप्रेशन या एंग्जायटी में बदल जाता है, लेकिन अब तक हम यह नहीं समझ पाए हैं कि ऐसा कुछ लोगों के साथ क्यों होता है और दूसरों के साथ नहीं। शोध के नतीजों से पता चलता है कि हिप्पोकैम्पस एक कंट्रोल सेंटर की तरह काम करता है जो ब्रेन को लंबे समय तक दर्द के प्रति इमोशनल रिस्पॉन्स को रेगुलेट करने में मदद करता है। डिप्रेशन होना इस बात पर निर्भर करता है कि यह सिस्टम समय के साथ कैसे रिस्पॉन्स देता है।

क्रोनिक दर्द दुनियाभर में 20 प्रतिशत से ज़्यादा एडल्ट्स को प्रभावित करता है और यह एंग्जायटी और डिप्रेशन से बहुत ज़्यादा जुड़ा हुआ है। लेकिन, लगातार दर्द वाले कई लोगों में ये दिक्कतें कभी नहीं होतीं, और इस अंतर के पीछे के बायोलॉजिकल कारण अभी भी साफ़ नहीं हैं। इसका पता लगाने के लिए, रिसर्चर्स ने यूनाइटेड किंगडम के बायोबैंक समेत बड़े पॉपुलेशन डेटासेट से ब्रेन स्कैन की जांच की। जिन लोगों को क्रोनिक दर्द था और जिनमें डिप्रेशन नहीं हुआ, उनका हिप्पोकैम्पल वॉल्यूम थोड़ा बड़ा था और इस हिस्से में एक्टिविटी ज्यादा थी। उन्होंने कुछ सीखने और याद रखने वाले कामों में भी बेहतर परफॉर्म किया, जिससे पता चलता है कि ब्रेन शुरू में लगातार दर्द के हिसाब से ढल सकता है। इसके उलट, जिन लोगों को क्रोनिक दर्द और डिप्रेशन दोनों थे, उनमें हिप्पोकैम्पल वॉल्यूम कम था, एक्टिविटी में रुकावट थी, और कॉग्निटिव परफॉर्मेंस खराब थी। लंबे समय के डेटा से पता चला कि ये अंतर एक साथ दिखने के बजाय धीरे-धीरे सामने आते हैं।