अखबारों के ‘सेवक’ और बाल मन के पारखी: डॉ. निरंकार देव 

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Published By Anjali Singh
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साहित्य की दुनिया में कुछ नाम ऐसे होते हैं, जो केवल कागजों पर नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के चरित्र में जीवित रहते हैं। बरेली की साहित्यिक विरासत के ऐसे ही एक अनमोल रत्न थे डॉ. निरंकार देव सेवक, जिसने अभावों के बीच रहकर भी बाल साहित्य के माध्यम से बरेली का मान पूरे भारतवर्ष में बढ़ाया। यह कहानी है एक विद्रोही कवि के कोमल बाल साहित्यकार बनने की, एक समर्पित मित्र की और एक ऐसे साधक की जिसने अंत तक अपनी कलम का साथ नहीं छोड़ा।

बरेली के इस बाल साहित्यकार की शख्सियत से रू-ब-रू करा रही रतन सिंह गुर्जर की विशेष रिपोर्ट... 

सादगी और सिद्धांतों का अनूठा संगम-डॉ. निरंकार देव सेवक का जीवन किसी खुली किताब की तरह था, जिसके हर पन्ने पर सादगी और अनुशासन की इबारत लिखी थी। बरेली के सैदपुरिया मोहल्ले में जन्मे सेवक जी के भीतर साहित्य के संस्कार अपने पिता मुंशी रामभरोसे लाल ‘सेवक’ से विरासत में मिले थे। पेशे से अग्रणी वकील होने के बावजूद उनका हृदय साहित्य के लिए धड़कता था। उनकी सादगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें खाने में कभी स्वाद की परवाह नहीं रही, उनके लिए भोजन केवल शरीर चलाने का साधन था।

बच्चन जी से आत्मीय रिश्ता- साहित्यिक गलियारों में सेवक जी और महाकवि हरिवंशराय बच्चन की मित्रता के किस्से आज भी मशहूर हैं। यह सेवक जी ही थे, जिन्होंने ज्ञान प्रकाश जौहरी के साथ मिलकर बरेली में बच्चन जी और तेजी सूरी की मुलाकात और फिर सगाई तय करवाई थी। बच्चन जी उन्हें ‘भाई साहब’ कहते थे और उन्होंने सेवक जी को करीब 250 पत्र लिखे। बच्चन जी का स्नेह इतना था कि वे अक्सर बरेली आकर बसने की इच्छा व्यक्त करते थे।

अखबारों का जुनून और समय की धारा- सेवक जी का दिन सुबह 5 बजे शुरू होता था और घर में 14 अखबारों का अंबार लगता था। जिला जेल के सामने वाले नाले के किनारे अखबार पढ़ते हुए टहलना उनका नियमित क्रम था। वे पढ़ने में इतने मशगूल हो जाते कि उन्हें आसपास की दुनिया का होश नहीं रहता था। यही एकाग्रता उनकी लेखनी में भी दिखती थी। विद्रोह से वैज्ञानिक चेतना तक सेवक जी ने अपने लेखन की शुरुआत ‘चिंगारी’ जैसे विद्रोही कविता संग्रह से की थी। उन्होंने अंग्रेजों की गुलामी के दौर में संतान न पैदा करने का कठिन संकल्प लिया था। हालांकि बाद में पारिवारिक दबाव में उन्होंने गृहस्थ जीवन को अपनाया। बाल साहित्य में उन्होंने एक नई चेतना फूंकी। उन्होंने पौराणिक कथाओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लिखा। वे कहते थे कि धर्म और रूढ़ियां बच्चों के मानसिक विकास में बाधा नहीं बननी चाहिए। उनके 36 प्रकाशित संग्रह आज भी हिंदी साहित्य की अमूल्य थाती हैं।

पारिवारिक त्रासदी और सेवा की मिसाल

सेवक जी का अंतिम समय काफी कष्टपूर्ण रहा। आंखों की रोशनी चली जाने के कारण उन्हें अपनी थाली का खाना तक नहीं दिखता था, लेकिन उनकी पुत्रवधू पूनम सेवक ने एक बेटी का धर्म निभाते हुए अंत तक अपने हाथों से उन्हें भोजन कराया। साल 1994 में सेवक जी का निधन हुआ और उसके बाद परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। 1999 में उनके पुत्र प्रदीप और पत्नी का देहांत हुआ और बाद में पोते पुनीत को भी नियति ने छीन लिया। आज सेवक जी का वह विशाल 2000 गज का बंगला भले ही वक्त की मार से छोटे से हिस्से में सिमट गया हो, लेकिन उनकी रचनाओं की गूंज आज भी हर उस बच्चे के मन में है, जिसने ‘दूध जलेबी’ या ‘ईसप की गाथाएं’ पढ़ी हैं। डॉ. निरंकार देव सेवक आज भी हमारे बीच अपनी कालजयी रचनाओं और अपनी बेबाक प्रगतिशील सोच के रूप में जीवित हैं।