सहेजनी होगी पारंपरिक चिकित्सा की विरासत

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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अमरपाल सिंह वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार

 

छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान के आधार पर अनपढ़ वैद्यों द्वारा साध्य-असाध्य रोगों के उपचार से जुड़ी मीडिया रिपोर्ट ध्यान आकर्षित करती है। वहां नारायणपुर के पास एक वैद्य बांस की छड़ी के सहारे रोग की पहचान करता है। जड़ी-बूटियों से दवा तैयार करता है। जब इस तरह के उदाहरण बार-बार सामने आते हैं, तो हैरानी पैदा करते हैं। हम भले ही छत्तीसगढ़ के एक इलाके की बात कर रहे हों, लेकिन यह मुद्दा किसी एक वैद्य या किसी एक पद्धति तक सीमित नहीं है। यह उस पूरे ज्ञान तंत्र का प्रश्न है, जिसे हमने आधुनिकता की अंधी दौड़ में हाशिए पर डाल दिया है। 

देश के जंगलों, गांवों और आदिवासी इलाकों में सदियों से विकसित हुआ पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान आज भी जीवित है, लेकिन उसकी मौजूदगी को हम या तो नजरअंदाज करते हैं या फिर उसे अंधविश्वास कहकर खारिज कर देते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ने मानव जीवन को अभूतपूर्व सुविधाएं और सुरक्षा प्रदान की है, लेकिन यह भी सच है कि हर ज्ञान प्रणाली की अपनी सीमाएं होती हैं। 

हमारे सामने ऐसे अनेक उदाहरण आते हैं, जब डॉक्टर किसी मरीज को जीवन के अंतिम पड़ाव पर मानकर परिजनों को उसकी ‘सेवा’ करने की सलाह देते हैं, लेकिन वही मरीज पारंपरिक उपचार के सहारे अपेक्षा से अधिक समय तक जीवन जी लेता है। ऐसे मामलों को संयोग कहकर टाल देना आसान है, लेकिन इसे वैज्ञानिक दृष्टि नहीं कहा जा सकता। वैज्ञानिक दृष्टिकोण का अर्थ किसी संभावना को नकारना नहीं होता, बल्कि उसे जांचने, समझने और परखने की प्रक्रिया से गुजरना होता है।

बस्तर के जंगलों में काम कर रहीं एक शोधकर्ता देवयानी शर्मा का प्रयास इस दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। उन्होंने ऐसे सैकड़ों वैद्यों को चिन्हित किया है, जो बिना औपचारिक शिक्षा के भी चिकित्सा की गहरी समझ रखते हैं। यह केवल दावों तक सीमित नहीं है। वहां के ट्रांस डिसिप्लिनरी हेल्थ साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी विश्वविद्यालय और आयुष विभाग ने उनके इलाज के तरीकों को सटीक मानते हुए प्रमाणित भी किया है। यह इस बात का संकेत है कि पारंपरिक ज्ञान को पूरी तरह खारिज करना न तो न्यायसंगत है और न ही विवेकपूर्ण। जिस पारंपरिक चिकित्सा को हम आज नजरअंदाज करते दिखाई देते हैं, वह केवल रोग के उपचार तक सीमित नहीं है बल्कि मरीज के साथ एक मानवीय संबंध भी स्थापित करती है। 

बस्तर के उदाहरण के आधार पर हर पारंपरिक उपचार को चमत्कारी मान लेना भी उचित नहीं होगा। ऐसा करना उतनी ही बड़ी भूल होगी, जितना पारंपरिक उपचार को पूरी तरह अवैज्ञानिक मान लेना है। आवश्यकता इस बात की है कि अनुभवजन्य ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच संवाद स्थापित किया जाए। इसके लिए पारंपरिक उपचारों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण, उनका वैज्ञानिक परीक्षण और उपयोगी विधियों का व्यापक प्रसार आवश्यक है।

हमारा देश पहले ही जनसंख्या के दबाव से जूझ रहा है। अस्पतालों में सीमित संसाधन और डॉक्टरों की कमी एक गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा कर रही है। ऐसे में यदि पारंपरिक चिकित्सा को समुचित महत्व दिया जाए, तो यह एक सहायक विकल्प के रूप में उभर सकती है। इसके लिए नीति निर्माताओं के स्तर पर गंभीर पहल की आवश्यकता है। यदि हम अपने जैविक संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान को संरक्षित नहीं करेंगे, तो यह विरासत धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगी। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और अवैज्ञानिक दोहन से जंगलों का विनाश हो रहा है। यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं है,  बल्कि उस ज्ञान संपदा का भी नुकसान है, जो इन्हीं प्राकृतिक परिवेशों में पनपी है। अफसोसनाक है कि जिस भारत देश में आयुर्वेद और लोक चिकित्सा की इतनी समृद्ध परंपरा रही है, उसी देश में आज इन विधाओं को बिसराया जा रहा है। (यह लेखक के निजी विचार हैं)