नए दौर के मुक्त व्यापार समझौते और भारतीय उद्योग

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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FTA भारत के लिए एक ‘ग्रोथ मल्टीप्लायर’ के रूप में कार्य कर सकते हैं। टैरिफ में कमी के कारण भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं।

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रजत मेहरोत्रा, वित्तीय एवं आर्थिक विशेषज्ञ

वैश्विक अर्थव्यवस्था तेजी से एक नए व्यापारिक ढांचे की ओर बढ़ रही है, जहां देशों के बीच प्रतिस्पर्धा केवल उत्पादन या लागत तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि बाजार तक पहुंच, टैरिफ नीति और सप्लाई चेन एकीकरण पर भी निर्भर हो गई है। भारत इस परिवर्तन के केंद्र में उभर रहा है और पिछले कुछ वर्षों में उसने मुक्त व्यापार समझौतों (Free Trade Agreements– FTA) के माध्यम से वैश्विक व्यापार में अपनी स्थिति मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। वर्तमान समय में भारत का कुल वस्तु एवं सेवा व्यापार लगभग 1.7 ट्रिलियन डॉलर से अधिक के स्तर पर पहुंच चुका है, जो यह दर्शाता है कि भारत तेजी से वैश्विक व्यापार का एक प्रमुख खिलाड़ी बन रहा है। 

भारत-यूएई के बीच व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (CEPA) लागू होने के बाद द्विपक्षीय व्यापार FY24 में लगभग 83–84 अरब डॉलर रहा और FY25 में यह 85 अरब डॉलर के आसपास पहुंचने का अनुमान है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि सही रणनीति के साथ ऐसे समझौते निर्यात वृद्धि को गति दे सकते हैं। इसी प्रकार, भारत-ऑस्ट्रेलिया आर्थिक सहयोग एवं व्यापार समझौते (ECTA) के तहत भारत के लगभग 100 प्रतिशत निर्यात को ऑस्ट्रेलिया में ड्यूटी-फ्री एक्सेस प्राप्त हुआ है, जिससे इंजीनियरिंग गुड्स, टेक्सटाइल और फार्मा जैसे क्षेत्रों को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिली है। इसके साथ ही, भारत-यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय संघ के साथ उन्नत स्तर की वार्ताएं यह संकेत देती हैं कि भारत अब वैश्विक व्यापार नेटवर्क में अपनी स्थिति को और मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

एक वित्तीय और आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो FTA भारत के लिए एक ‘ग्रोथ मल्टीप्लायर’ के रूप में कार्य कर सकते हैं। टैरिफ में कमी के कारण भारतीय उत्पाद वैश्विक बाजार में अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाते हैं, जिससे निर्यात में वृद्धि होती है और विदेशी मुद्रा आय बढ़ती है। इसके साथ ही, यह समझौते विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) को भी आकर्षित करते हैं, क्योंकि वैश्विक कंपनियां भारत को एक निर्यात हब के रूप में देखने लगती हैं। ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति के तहत कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपनी सप्लाई चेन को विविध बनाना चाहती हैं, और भारत इस अवसर का लाभ उठा सकता है। विशेष रूप से ऑटो कंपोनेंट्स, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और टेक्सटाइल जैसे क्षेत्रों में भारत की प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति मजबूत हो सकती है, जिससे रोजगार सृजन और औद्योगिक विकास को बढ़ावा मिलेगा।

इन अवसरों के साथ कई महत्वपूर्ण चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि क्या भारतीय उद्योग, विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (MSME), वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए पूरी तरह तैयार हैं। जब टैरिफ कम होते हैं, तो विदेशी उत्पाद भारतीय बाजार में सस्ते हो जाते हैं, जिससे घरेलू उद्योगों पर दबाव बढ़ता है। यदि भारतीय कंपनियां लागत, गुणवत्ता और तकनीक के स्तर पर प्रतिस्पर्धी नहीं बन पातीं, तो यह स्थिति उनके लिए नुकसानदेह हो सकती है। इसके अलावा, कई मामलों में FTA के बाद आयात तेजी से बढ़ते हैं, जबकि निर्यात अपेक्षाकृत धीमी गति से बढ़ते हैं, जिससे व्यापार घाटा बढ़ने का जोखिम बना रहता है। यह स्थिति मुद्रा पर दबाव डाल सकती है और व्यापक आर्थिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है।

कृषि क्षेत्र इस संदर्भ में और भी संवेदनशील है, क्योंकि भारत की बड़ी आबादी इस पर निर्भर है। यदि कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क कम होते हैं, तो विदेशी सस्ते उत्पाद भारतीय बाजार में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे किसानों की आय प्रभावित हो सकती है, हालांकि भारत ने हालिया समझौतों में डेयरी और कुछ अन्य संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षित रखने की रणनीति अपनाई है, जो एक संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाता है। फिर भी, यह आवश्यक है कि कृषि क्षेत्र को प्रतिस्पर्धात्मक बनाने के लिए तकनीकी सुधार, भंडारण और सप्लाई चेन इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जाए।

वित्तीय बाजारों के दृष्टिकोण से FTA का प्रभाव बहुआयामी होता है। निर्यात-उन्मुख कंपनियों जैसे आईटी, फार्मा, टेक्सटाइल और इंजीनियरिंग सेक्टर को इससे लाभ मिल सकता है, जिससे उनके शेयरों में सकारात्मक रुझान देखने को मिल सकता है। इसके विपरीत, आयात-निर्भर उद्योगों पर दबाव बढ़ सकता है। यदि FTA के कारण निर्यात में वृद्धि होती है, तो इससे रुपये को स्थिरता मिल सकती है और विदेशी निवेश (FDI) में वृद्धि हो सकती है। वहीं, यदि व्यापार घाटा बढ़ता है, तो यह मुद्रा और शेयर बाजार दोनों के लिए चुनौती बन सकता है, इसलिए निवेशकों के लिए यह आवश्यक है कि वे सेक्टर-आधारित रणनीति अपनाएं और उन कंपनियों पर ध्यान दें, जिनकी वैश्विक प्रतिस्पर्धा क्षमता मजबूत है। (यह लेखक के निजी विचार हैं)