योग-साधना की चरम अवस्था है समाधि

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Published By Anjali Singh
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साधना का सार है समाधि। सर्वस्व है, उपसंहार है। निष्कर्ष है। फल है। प्रतिफल है। परिणाम है। समाधि दो शब्दों से मिलकर बना है- सम और धी। सम यानि सम्यक या एक जैसा होना। धी यानी बुद्धि या प्रज्ञा। इस प्रकार समाधि का अर्थ हुआ बुद्धि का एक समान स्तर पर होना। समत्व की स्थिति में होना। समदर्शी होना। समदृष्टि होना। स्थिरबुद्धि होना। इसका एक अर्थ है समय आधि अर्थात समय के पार जाना। योग-साधना की चरम अवस्था है समाधि, लेकिन ध्यान रहे समाधि मंजिल नहीं है, यह केवल एक पड़ाव है। आध्यात्म की असली यात्रा इसके बाद ही शुरू होती है।

त्रिगुणात्मक प्रकृति के प्रभाव से परे

यदि कोई साधक समाधि की अवस्था को उपलब्ध है, तो इसका अर्थ यह हुआ कि साधक सम अवस्था में है। वह सुख-दुख, हानि-लाभ, मान-अपमान आदि द्वंदों से मुक्त है, परे है। उस स्थिति में साधक का कोई पृथक अस्तित्व नहीं रहता। साधक का ब्रह्म में अवस्थान हो जाता है। भगवान की सत्ता, चैतन्य और आनंद अपने आप साधक की वाणी, भाव और कार्य के द्वारा पूर्ण रूप से प्रस्फुटित होने लगते हैं। समाधि की अवस्था में प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति आदि चित्तवृत्तियां मिट जाती हैं।

समाधि की अवस्था को पा लेने पर साधक जीवमात्र को जीवन-मरण और संसारचक्र में घुमाने वाले महादुखदायक अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश आदि पंचक्लेशों से मुक्त हो जाता है, पर यह अवस्था पाना आसान नहीं है। कई पड़ाव पार करने होते हैं। एक लंबी अवधी की प्रक्रिया है। आत्मा के ऊपर से अविद्या, अज्ञान का आवरण हट जाता है।

जिस प्रकार बादलों के आवरण से मुक्त होते ही सूर्य का तेज प्रकट हो जाता है, वैसे ही अविद्या, अज्ञान का आवरण हटते ही, मिटते ही आत्मा अपने यर्थास्वरूप को पहचानकर परमात्मा में स्थित हो जाती है। साधक सत, रज, तम आदि त्रिगुणात्मक प्रकृति के प्रभाव से परे हो जाता है। वह शब्द, रूप, रस, गंध आदि तन्मात्राओं के प्रभाव से भी परे हो जाता है।

समाधि के चरण

समाधि के दो चरण या स्तर बताये गए हैं- संप्रज्ञता व असंप्रज्ञता। संप्रज्ञता समाधि के 4 प्रकार हैं- पहला है सवितर्क समाधि। यह समाधि का वह रूप है जिसमें स्थूल विषय पर ध्यान लगाया जाता है। उदाहरणस्वरूप मूर्ति पर ध्यान जमाने को सवितर्क समाधि कहा जाता है। दूसरी है सविचार समाधि। यह समाधि का वह रूप है, जिसमें सूक्ष्म विषय पर ध्यान लगाया जाता है। इस समाधि में कभी-कभी तन्मात्रा भी ध्यान का विषय होती है। तीसरी है सानंद समाधि। इस समाधि में ध्यान का विषय इंद्रियां रहती हैं। हमारी इंद्रियां 11 हैं- 5 ज्ञानेन्द्रियां, 5 कर्मेन्द्रियां और मन। इन्हीं पर ध्यान लगाया जाता है। चौथी है सस्मित समाधि। इस अवस्था में ध्यान का विषय अहंकार है। अहंकार को अस्मिता कहा जाता है। कुछ विद्वानों का कहना है कि संप्रज्ञता समाधि वैराग्य से धुले हुए निर्मल चित्त की परिणिती है। इस समाधि में चित्त शुद्ध तो होता है, पर चित्त में कर्मों के संस्कारों के बीज अभी भी शेष रहते हैं। इसलिए इसे सबीज समाधि भी कहते हैं। इसलिए इस सबीज को निर्बीज करने के लिये समाधि के अगले चरण में प्रवेश करना होता है, जिसे असंप्रज्ञता या निर्बीज समाधि कहते हैं। असंप्रज्ञता समाधि में सारी मानसिक क्रिया की समाप्ति हो जाती है। मन केवल अप्रकट संस्कारों को धारण किए रहता है।

इस प्रकार समाधि का पहला चरण अर्थात संप्रज्ञता समाधि- शुचिता का है। समाधि का दूसरा चरण अर्थात असंप्रज्ञता समाधि- विलीनता का है। समाधि के प्रथम चरण अर्थात संप्रज्ञता समाधि में साधक के मन की सारी अशुद्धि तिरोहित हो जाती है। सभी विकार व बुराइयां मिट जाती हैं। पर चित्त में कर्म संस्कारों के बीज बने रहते हैं। समाधि के दूसरे चरण अर्थात असंप्रज्ञता समाधि में कर्म संस्कारों के बीज भी नष्ट हो जाते हैं और चित्तवृत्तियों का पूर्णतः निरोध हो जाता है। 

असंप्रज्ञता समाधि की अवस्था में बुराई भी गिर जात है और अच्छाई भी। यहां तक कि अच्छाई या शुद्ध अवस्था को धारण करने वाला मन भी समाप्त हो जाता है। यह अ-मन की अवस्था है। मन की यह समाप्ति प्रकारांतर से देहबोध की समाप्ति है। इस अवस्था में दे हके पृथक होने का एहसास होता है। इस अवस्था में आत्मा अपने यथार्थस्वरूप को पहचान लेती है। और आत्मा का संपर्क विभिन्न विषयों से छूट जाता है। यही मोक्ष की अवस्था है। नियत समय, नियम स्थान, नियमित साधना व सात्विक आहार-विहार व संयम का पालन करते हुये कोई भी साधक इस परम आनंद, परम सुख की अवस्था को पा सकता है। बशर्ते उसे पूर्णगुरू का सानिध्य मिले तब। अन्यथा भटकाव निश्चित है।-आचार्य प्रदीप द्विवेदी, आध्यात्मिक लेखक