कॉलेज का पहला दिन : किसी नई जगह खुद को ढालने में लगता है समय

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
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जिस अगली सुबह मेरे कॉलेज का पहला दिन था, उस रात बेचैनी के कारण मैं सो नहीं सका। सुबह उठने में देर हुई फिर इतनी जल्दी तैयार हुआ मानो समय से न पहुंचा तो गेट पर खड़ा कर दिया जाऊंगा। आखिर इंटर कॉलेज वाले सख्त अनुशासन के माहौल की आदत जो थी। दिल में अजीब-सी हलचल थी- थोड़ा डर, थोड़ा उत्साह, थोड़ा गर्व और बहुत सारी उम्मीदें। बहरहाल नाश्ता करके मम्मी पापा का आशीर्वाद लिया और चल पड़ा अपनी स्कूटी लेकर कॉलेज की ओर। लखनऊ के रास्ते में सुबह-सुबह वाहनों के हॉर्न से गूंज रहे थे। किसी तरह मैं अपने कॉलेज बीबीडी पहुंचा। कॉलेज का गेट देखते ही दिल धक स रह गया। इतना विशाल बड़ा मैदान? ऊंची इमारतें और हर तरफ छात्र-छात्राओं की जमघट। गेट पर कुछ सीनियर वेलकम फ्रेशर्स चिल्ला रहे थे और मैं अपने नये बैग के साथ दिल की धड़कनें भी थामे हुआ था। 

मन में अजीब सी उधेड़बुन चल रही थी-  कहां जाऊं पहले, कुछ किसी से पूछूं तो जवाब देगा कि नहीं? -हर्ष पंत, हल्द्वानी

बहरहाल, एक उत्साह भी था- स्कूल की यूनिफॉर्म से आजादी, नए चेहरे, इंजीनियरिंग क्लासों के सपने जो दीवाली की रोशनी से भी चमकदार लगते थे। एक सीनियर ने तो मेरा बैग देखकर कहा, “भाई, ये तो लगता है स्कूल का बैग है!” सब हंस पड़े। मुझे भी हंसी आ गई। थोड़ा उत्साह बढ़ा और एडमिशन प्रोसेस के बाद चल पड़ा अपनी क्लास की तलाश में। कैंपस का नक्शा ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने सर्किट डायग्राम बनाकर बोला हो- ढूंढ लो अपना क्लास, अगर दम है तो। इधर-उधर भटकते बहुत मुश्किल से मैं अपनी क्लास पहुंचा। यहां पहुंच कर मुझे ऐसी उपलब्धि का एहसास हुआ मानो मैं डिटेक्टिव शरलॉक होम्स हूं और क्लास ढूढ़ कर मैंने कोई बड़ा केस सॉल्व कर दिया हो। 

क्लास के भीतर पहुंचते ही मैं आखिरी सीट की ओर बढ़ा लेकिन लेट होने के कारण वो सीट भी खाली नहीं थी। फिर मायूसी को भुलाकर मैं राइट साइड की दूसरी सीट पर बैठा। वहां मेरी मुलाकात कुछ दोस्तों से भी हुई जिनका नाम अरुण ओर अमित था। बात करने पर पता चला कि उनका भी पहला दिन था और इससे पहले वे भी गलत क्लास में चले गए थे, जहां मैनेजमेंट स्टूडेंट्स बैठे थे। 

हम कुछ बात कर पाते कि तभी एंट्री हुई कॉलेज के हेड की। उन्होंने हमें कॉलेज के नियम बताए। फिर कहा कुछ मन सवाल हो तो पूछो। मैंने भी स्मार्टनेस दिखाने में चूक न की और उनसे पासिंग् मार्कस पूछ लिया। इस सवाल पर पूरी क्लास हंस पड़ी। मानो मानसून की पहली फुहार। जवाब में हेड ने कहा इसका जवाब पूरी क्लास का पहला कार्यभार है। उसके बाद बाकी टीचर ने अपना कार्यक्रम बताया।  जब लंच हुआ तो मैं अमित के साथ चल पड़े कैंटीन की ओर। वहां पता चला की सीनियर्स, फ्रेशर्स को माधुरी दीक्षित के हिट गाने पर डांस करा रहे थे। कुछ ठुमके मारने के बाद हमने भी लाजवाब समोसे का लुफ्त उठाया। फिरर चल पड़े वापस क्लास की ओर। वहां जाने पर पता चला कि छुट्टी हो गयी है। 

बाद में हम लोग बाकी दोस्तों से मिले जो हॉस्टल में रहते थे। कोई क्रिकेटर था तो कोइ डांसर। हमने नाम और फोन नंबर एक दूसरे का जाना और फिर दोस्तों को कल मिलने का वादा कर मैं निकल पड़ा घर की ओर। घर की ओर जाते वक्त मन रोमांचित हो रहा था। रात को सोते समय बार-बार मन में यहीं आ रहा था कि कल से नई जिंदगी शुरू होगी। कॉलेज का पहले दिन भले थोड़ी उलझन लगी, लेकिन यही दिन आगे चलकर खूबसूरत सफर में बदल गया। पहला दिन हमें सिखाता है कि हर नई जगह खुद को ढालने में समय लगता है, फिर वक्त गुजरने के साथ वही जगह अपनी लगने लगती है।