ओपेक से यूएई के अलग होने का वैश्विक प्रभाव

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Published By Deepak Mishra
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प्रो. एचसी पुरोहित, दून यूनिवर्सिटी

 

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने ओपेक और ओपेक प्लस की अपनी लगभग 59 साल पुरानी सदस्यता आधिकारिक रूप से समाप्त कर दी। यूएई के इस अलगाव की चर्चाओं ने अंतर्राष्ट्रीय बाजार में हलचल पैदा कर दी है, क्योंकि इस निर्णय का तेल की कीमतों, आपूर्ति-प्रणाली और वैश्विक आर्थिक संतुलन पर व्यापक प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देगा। यूएई की ओपेक में लगभग 12 प्रतिशत की हिस्सेदारी है और यह इस समूह का लगभग तीसरा बड़ा उत्पादक है।

ओपेक की स्थापना सितंबर 1960 में हुई थी। यह तेल उत्पादक देशों के बीच एक समन्वयक संस्था के रूप में कार्य कर रहा है। ओपेक का कार्य तेल उत्पादन को नियंत्रित करके कीमतों में स्थिरता बनाए रखना है। यूएई जैसे महत्वपूर्ण भागीदार के इस संगठन से अलग होने से ओपेक की एकजुटता प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होगी और वैश्विक ऊर्जा बाजार में संतुलन भी बदल सकता है।

यूएई के इस निर्णय का सीधा प्रभाव तेल की कीमतों पर पड़ सकता है। ओपेक की ताकत उसके सदस्य देशों के बीच उत्पादन को नियंत्रित करने की सामूहिक क्षमता में निहित है। यूएई इस व्यवस्था से बाहर आकर स्वतंत्र रूप से उत्पादन बढ़ाता है, तो वैश्विक बाजार में तेल की आपूर्ति बढ़ सकती है, जिससे कीमतों में गिरावट आ सकती है, हालांकि यह गिरावट स्थायी नहीं होगी, लेकिन यह वैश्विक बाजार को काफी हद तक अस्थिर करने में निर्णायक सिद्ध होगी। दीर्घकाल में, जब ओपेक में समन्वय कमजोर होगा, तब बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है, जिससे तेल कीमतों में अचानक उतार-चढ़ाव हो सकता है।

यूएई के अलग होने से स्पष्ट है कि ओपेक के भीतर मतभेद बढ़ रहे हैं। इससे अन्य सदस्य देश, जैसे सऊदी अरब, कुवैत, इराक, लीबिया, इंडोनेशिया आदि भी अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार स्वतंत्र नीति अपनाने के लिए प्रेरित हो सकते हैं। इस प्रकार, वैश्विक ऊर्जा शासन में विखंडन की प्रवृत्ति बढ़ेगी, जिससे ओपेक के अस्तित्व पर भी प्रश्न खड़े हो सकते हैं।

यूएई का निर्णय वैश्विक आर्थिक स्थिरता की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि कीमतें गिरती हैं, तो परिवहन और उत्पादन लागत में कमी आएगी, जिससे महंगाई पर नियंत्रण संभव होगा। इसके विपरीत, यदि कीमतों में अस्थिरता बढ़ती है, तो यह आपूर्ति-श्रृंखला को प्रभावित कर सकती है, जिससे महंगाई बढ़ सकती है। तेल के सस्ता होने से नवीकरणीय ऊर्जा, सौर और पवन ऊर्जा में निवेश की गति भी धीमी हो सकती है, जो ‘ग्रीन ट्रांजिशन’ की दिशा को प्रभावित करेगा और दीर्घकाल में नेट जीरो का लक्ष्य भी प्रभावित होगा।

भारत पर इसके प्रभाव बहुआयामी होंगे, क्योंकि भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। हम अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का लगभग 85 प्रतिशत आयात करते हैं। ऐसे में तेल की कीमतों में कोई भी परिवर्तन सीधे भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। यूएई द्वारा तेल का उत्पादन बढ़ाने से तेल की कीमतों में गिरावट होना स्वाभाविक है और यह स्थिति भारत के लिए लाभकारी अवसर के रूप में उभरेगी। भारत सस्ते तेल का लाभ उठाकर अपने रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को बढ़ा सकता है, जिससे किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम होगी।

यूएई के इस कदम से स्थानीय मुद्रा में व्यापार को बढ़ावा मिल सकता है। भारत और यूएई रुपये और दरहम में तेल भुगतान से अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता घटेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि यूएई का ओपेक प्लस से बाहर आना भारत के लिए अच्छी खबर है, क्योंकि भारत और यूएई रणनीतिक साझेदार हैं।

ऐसे में द्विपक्षीय व्यापारिक संबंधों का लाभ भारत को मिलेगा। यदि यूएई तेल का उत्पादन बढ़ाता है, तो इससे तेल की कीमतों में कमी आएगी, जिसे देखकर दूसरे देश भी यूएई के कदम पर चल सकते हैं। भारत को इस अनिश्चितता के बीच नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ाना चाहिए, ताकि दीर्घकाल में ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। (यह भी लेखक निजी विचार हैं)

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