Bareilly:बिगड़ी जैविक घड़ी बढ़ा सकती है आत्महत्या का खतरा, देर रात जागना करें बंद 

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Edited By Amrit Vichar
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बरेली, अमृत विचार। महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय के फार्मेसी विभाग के शोधकर्ता डॉ. अमित कुमार वर्मा और उनकी टीम के अध्ययन में खुलासा हुआ है कि मानव शरीर की बिगड़ी जैविक घड़ी आत्महत्या के खतरे को बढ़ा सकती है। शोध में यह भी सामने आया है कि देर रात और सुबह के शुरुआती घंटों में आत्महत्या के विचार और प्रयास अधिक देखे जाते हैं।

प्रो. डॉ. अमित कुमार वर्मा का यह समीक्षा आधारित शोध प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका बिहेवियरल ब्रेन रिसर्च के वॉल्यूम-502 में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में विभिन्न राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रों का विश्लेषण कर मानसिक स्वास्थ्य और जैविक घड़ी के बीच गहरे संबंध को रेखांकित किया गया है। 

उन्होंने बताया कि जैविक घड़ी शरीर की 24 घंटे चलने वाली प्राकृतिक प्रणाली है, जो नींद-जागरण चक्र, हार्मोन स्राव, शरीर का तापमान, ऊर्जा स्तर और भावनात्मक स्थिति को नियंत्रित करती है। आधुनिक जीवनशैली जैसे देर रात तक मोबाइल और स्क्रीन का उपयोग, अनियमित नींद, धूप की कमी, शिफ्ट में काम और लगातार तनाव इस जैविक घड़ी को असंतुलित कर देते हैं। इसके कारण अवसाद, चिंता, चिड़चिड़ापन और मानसिक तनाव बढ़ने लगता है।

उन्होंने मस्तिष्क के दो महत्वपूर्ण हिस्सों सुप्राकियाजमैटिक न्यूक्लियस और लेटरल हैबेनुला के बीच असंतुलन को भी आत्महत्या के बढ़ते जोखिम से जोड़ा है। शोध में जोखिम समय अवधि की अवधारणा भी प्रस्तुत की गई है, जिसके अनुसार दिन के कुछ समय व्यक्ति मानसिक रूप से अधिक संवेदनशील हो जाता है और उसकी निर्णय क्षमता प्रभावित हो सकती है। 

शोध टीम में गुजरात, कोयंबटूर, लखनऊ, ओंगोल और चेन्नई के विभिन्न संस्थानों के भी विशेषज्ञ शामिल रहे। कुलपति प्रो. केपी सिंह ने शोध को मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में मील का पत्थर बताते हुए कहा कि यह अध्ययन आत्महत्या जैसे गंभीर मुद्दे के पीछे जैविक कारणों को समझने में मदद करेगा और समय-आधारित उपचार पद्धतियों को नई दिशा देगा।

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