मौजूदा वैश्विक संकट के बीच रूसी विदेश मंत्री का बड़ा बयान, कहा-भारत-रूस की दोस्ती 'अटूट', भरोसा हमारी ताकत
दिल्ली। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने बुधवार को भारत-रूस संबंधों को "गहरे भरोसे पर आधारित और लंबे समय से चले आ रहे रणनीतिक साझेदारी" करार देते हुए कहा कि दोनों देशों के संबंध केवल तेल और रक्षा सहयोग तक सीमित नहीं हैं। लावरोव ने आरटी इंडिया को दिए एक विस्तृत साक्षात्कार में भारत की स्वतंत्रता के समय से द्विपक्षीय संबंधों की शुरुआत का उल्लेख करते हुए कहा कि सोवियत संघ दौर के दशकों पुराने सहयोग ने आज की "विशेष रणनीतिक साझेदारी" की नींव रखी। जब उनसे पूछा गया कि क्या भारत-रूस संबंध मुख्य रूप से ऊर्जा और रक्षा व्यापार पर आधारित हैं, तो उन्होंने इस धारणा को खारिज करते हुए कहा, "यह केवल तेल और गैस तक सीमित नहीं है, यह इससे कहीं अधिक व्यापक है।"
उन्होंने परमाणु ऊर्जा, औद्योगिक उत्पादन, शिक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच बढ़ते सहयोग का उल्लेख किया। श्री लावरोव ने कहा कि दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग "खरीदार-विक्रेता" मॉडल से आगे बढ़कर संयुक्त उत्पादन व्यवस्था में बदल चुका है।
उन्होंने ब्रह्मोस मिसाइल के संयुक्त उत्पादन, भारत में टी-90 टैंक के लाइसेंस प्राप्त निर्माण और कलाश्निकोव असॉल्ट राइफल के उत्पादन जैसी परियोजनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि ये पहल दोनों देशों के बीच "उच्च स्तर के विश्वास" को दर्शाती हैं और रक्षा सहयोग में गोपनीयता भी न्यूनतम स्तर पर है।
लावरोव ने भारत के लिए रूस को "विश्वसनीय ऊर्जा आपूर्तिकर्ता" बताते हुए तेल, गैस, कोयला और परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग जारी रहने की बात कही। उन्होंने कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र परियोजना का भी उल्लेख किया। उन्होंने व्यापार विविधीकरण और दीर्घकालिक आर्थिक योजना पर भी जोर देते हुए कहा कि 2030 तक भारत-रूस सहयोग से जुड़े कई समझौते आगे बढ़ाए जा रहे हैं। साक्षात्कार का बड़ा हिस्सा वैश्विक भू-राजनीति, प्रतिबंधों, ऊर्जा बाजार और पश्चिमी प्रभाव पर केंद्रित रहा।
लावरोव ने रूसी ऊर्जा कंपनियों पर लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों की आलोचना करते हुए कहा कि रोज़नेफ्ट और लुकोइल जैसी कंपनियों को निशाना बनाने का उद्देश्य रूस को वैश्विक बाजारों से बाहर करना और ऊर्जा निर्भरता को पश्चिमी आपूर्तिकर्ताओं की ओर मोड़ना है। उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य सहित वैश्विक समुद्री मार्गों और ऊर्जा गलियारों को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा पर भी चिंता जताई। उन्होंने ब्रिक्स जैसे बहुपक्षीय मंचों को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि ये स्वतंत्र वित्तीय और व्यापारिक व्यवस्था विकसित करने के लिए आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि रूस ब्रिक्स में भारत की मौजूदा अध्यक्षता का समर्थन करता है और सीमा पार भुगतान प्रणाली, स्थानीय मुद्रा में व्यापार निपटान तथा स्वतंत्र वित्तीय ढांचे जैसे मुद्दों पर प्रगति की उम्मीद करता है।
उन्होंने कहा, "भारत ने अपनी प्राथमिकताओं में ऐसे लक्ष्यों को शामिल किया है जो उसके राष्ट्रीय हितों को दर्शाते हैं, 2047 तक निर्धारित उद्देश्यों की दिशा में प्रगति सुनिश्चित करते हैं और ब्रिक्स में सहमति के सिद्धांत को बनाए रखते हैं।" लावरोव ने कहा कि कजान शिखर सम्मेलन में भुगतान, पुनर्बीमा और विनिमय तंत्र को पश्चिमी प्रतिबंधों और राजनीतिक दबाव से स्वतंत्र बनाने का निर्णय लिया गया था और भारत इस दिशा में सक्रिय रूप से कार्य कर रहा है।
उन्होंने कहा कि भारत ने व्यापार, आर्थिक एवं वित्तीय सहयोग, राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दों तथा सांस्कृतिक एवं मानवीय संपर्क जैसे ब्रिक्स के तीनों प्रमुख आयामों में सक्रिय एजेंडा प्रस्तुत किया है। भारत के "विकसित भारत 2047" लक्ष्य पर टिप्पणी करते हुए लावरोव ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को "ऊर्जावान नेता" बताया और कहा कि रूस भारत की दीर्घकालिक विकास महत्वाकांक्षाओं का समर्थन करता है। उन्होंने ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक विकास और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को भारत के भविष्य में रूस के संभावित योगदान के प्रमुख क्षेत्रों के रूप में रेखांकित किया।
लावरोव ने क्षेत्रीय तनावों पर कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच शांतिपूर्ण संवाद का रूस समर्थन करता है। उन्होंने कहा कि ऐसे विवादों का समाधान अंततः द्विपक्षीय स्तर पर और बिना किसी बाहरी हस्तक्षेप के होना चाहिए। श्री लावरोव ने कहा कि भारत-रूस संबंध केवल सरकारी हितों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक और जन-से-जन संबंधों पर भी आधारित हैं। उन्होंने कहा, "हिंदी-रूसी भाई-भाई केवल एक नारा नहीं है", और यह साझेदारी अपने ऐतिहासिक गहराई और आपसी विश्वास के कारण "टूटने की कल्पना से परे" है।
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