Vat Savitri Vrat: काशी में शनि जयंती और वट सावित्री व्रत की धूम, सौभाग्य और परिवार की मंगलकामना संग महिलाओं ने रखा व्रत
वाराणसी। वट सावित्री व्रत ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को मनाया जाता है। पति की दीर्घायु तथा परिवार की सुख-समृद्धि के लिए काशी में व्रती महिलाएं विभिन्न स्थानों पर वट वृक्ष की पूजा कर रही हैं। पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते हुए सुहागिन महिलाएं वट सावित्री के दिन व्रत रखने के साथ बरगद के पेड़ की पूजा-अर्चना कर सुखी वैवाहिक जीवन की मंगलकामना करती हैं।
इस बार अमावस्या पर शनि जयंती का शुभ योग भी बन रहा है। काशी तीर्थ पुरोहित सभा के अध्यक्ष एवं धर्मकूप (मीरघाट-दशाश्वमेध) स्थित वट सावित्री माता मंदिर के प्रधान पुरोहित पं. कन्हैयालाल त्रिपाठी ने बताया कि काशीखंडोक्त के अनुसार, कंचनवट सावित्री का संयुक्त मंदिर दशाश्वमेध क्षेत्र के मीरघाट स्थित धर्मकूप मुहल्ले में है। यहां आज के दिन पूजा करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।
वट सावित्री व्रत हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है, खासकर विवाहित महिलाओं के लिए। यह व्रत ज्येष्ठ मास की अमावस्या को रखा जाता है। इस दिन बरगद के पेड़ की पूजा करना अनिवार्य माना जाता है, क्योंकि धार्मिक मान्यता है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देव बरगद के वृक्ष में निवास करते हैं। श्री त्रिपाठी ने बताया कि इस वर्ष वट सावित्री व्रत पर शनि जयंती के साथ सौभाग्य योग और शोभन योग का निर्माण हो रहा है।
साथ ही ग्रहों की स्थिति से बुधादित्य, नवपंचम, गजलक्ष्मी, विपरीत राजयोग जैसे कई राजयोग बन रहे हैं। पुरानी कथाओं के अनुसार, सावित्री ने वट वृक्ष के नीचे बैठकर कठोर तपस्या की थी। इसी कारण इस व्रत को वट सावित्री व्रत कहा जाता है। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष के नीचे बैठकर वट सावित्री व्रत कथा सुनती हैं। बिना कथा सुने व्रत पूरा नहीं माना जाता। इस व्रत के माध्यम से महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और सुखी दांपत्य जीवन की कामना करती हैं।
यह भी पढ़ें:
रामलीला मैदानों का कायाकल्प, 23 परियोजनाओं के बजट को मिली मंजूरी, सुदृढ़ीकरण और सौंदर्यीकरण पर खर्च होंगे करोड़ों
