यशवंत वर्मा नकदी मामला : जांच समिति ने लोकसभा अध्यक्ष को सौंपी रिपोर्ट, संसद में होगी पेश
नई दिल्ली। न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच कर रही एक जांच समिति ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास से कथित तौर पर जले हुए नोट मिलने के बाद उन्हें हटाने की कार्यवाही शुरू की गई थी। लोकसभा सचिवालय ने बताया कि न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत वैधानिक आवश्यकताओं के अनुपालन में प्रस्तुत की गई यह रिपोर्ट उचित समय पर संसद के दोनों सदनों में पेश की जाएगी।
संसद की अगली बैठक मानसून सत्र में होगी, जो आमतौर पर जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू होता है। लोकसभा अध्यक्ष ने 12 अगस्त, 2025 को तीन सदस्यीय जांच समिति का गठन किया था। न्यायमूर्ति वर्मा के दिल्ली स्थित आधिकारिक आवास में 14 मार्च, 2025 की रात को आग लग गई थी और इसी दौरान दमकलकर्मियों ने कथित तौर पर उनके बंगले के एक भंडारगृह में भारी मात्रा में जली हुई मुद्रा बरामद की।
न्यायमूर्ति वर्मा उस वक्त दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे और बाद में उन्हें उनके मूल न्यायालय इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वापस भेज दिया गया था। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश संजीव खन्ना द्वारा गठित एक आंतरिक समिति ने निष्कर्ष निकाला था कि न्यायमूर्ति वर्मा का उस विशिष्ट भंडारगृह पर ''प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नियंत्रण'' था, जहां कथित तौर पर नकदी छिपाई गई थी।
जुलाई 2025 में, 200 से अधिक सांसदों ने न्यायाधीश को हटाने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए। उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश और मुख्य निर्वाचन आयुक्त को केवल संसद द्वारा न्यायाधीश (जांच) अधिनियम में उल्लिखित प्रक्रिया के तहत ही हटाया जा सकता है। पिछले साल अगस्त में लोकसभा अध्यक्ष बिरला ने आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय न्यायाधीश जांच समिति का गठन किया था।
हालांकि, संसद द्वारा पद से हटाए जाने की आशंका के बीच न्यायमूर्ति वर्मा ने पिछले दिनों इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया जिससे उनके खिलाफ बर्खास्तगी की कार्यवाही रुक गई। उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति और बर्खास्तगी की प्रक्रिया से परिचित लोगों ने बताया कि शीर्ष अदालत के एक फैसले के अनुसार किसी न्यायाधीश द्वारा राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंपने और उसकी प्रति सार्वजनिक करने के बाद ''माना जाता है कि उसने इस्तीफा दे दिया''।
उन्होंने कहा कि किसी न्यायाधीश का इस्तीफा राष्ट्रपति की ''स्वीकृति के अधीन'' नहीं होता। प्रक्रिया के अनुसार, राष्ट्रपति द्वारा ''औपचारिक स्वीकृति'' दी जाती है जिसके बाद विधि मंत्रालय के न्याय विभाग द्वारा इसे अधिसूचित किया जाता है। न्यायमूर्ति वर्मा का नाम अब भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में दर्ज है। उच्चतम न्यायालय के फैसले और पूर्व उदाहरणों के अनुसार न्यायमूर्ति वर्मा ने इस्तीफा दे दिया है और अब वह एक आम नागरिक हैं।
प्रक्रिया से परिचित एक व्यक्ति ने बताया, ''इसके अनुसार, संसद द्वारा किसी पूर्व न्यायाधीश को पद से नहीं हटाया जा सकता।'' वैसे न्यायमूर्ति वर्मा पांच जनवरी, 2031 को 62 वर्ष की उम्र पूरी होने पर सेवानिवृत्त होते। जांच समिति ने उस समय काम शुरू किया था जब वर्मा न्यायाधीश पद पर थे और बाद में उनके इस्तीफे का समिति के काम पर कोई असर नहीं पड़ा।
विशेषज्ञ ने स्पष्ट किया, ''जब समिति आरोपों की जांच करती है, तो इसे न्यायिक कार्य माना जाता है। उन्होंने अपने काम की रिपोर्ट प्रस्तुत की है... यह एक अलग लेकिन संबंधित मुद्दा है।'' उपरोक्त व्यक्ति ने कहा कि रिपोर्ट संसद में पेश होने के बाद यह देखना होगा कि सदन में क्या निर्णय लिया जाता है।
