उम्मीदों और कॉर्पोरेट के बीच फंसा युवा

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Published By Deepak Mishra
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डिग्री पूरी होते ही ऊंची सैलरी, तेज़ प्रमोशन और ‘सम्मानजनक’ पद को पहली नौकरी का स्वाभाविक परिणाम मान लिया गया है, लेकिन कॉर्पोरेट जगत इस तर्क पर नहीं चलता।

SHIVAM BHARDWAJ
डॉ. शिवम् भारद्वाज, असिस्टेंट प्रोफेसर 


भारत में रोजगार का संकट सिर्फ नौकरियों की संख्या का नहीं है; यह अपेक्षाओं और वास्तविकताओं के टकराव का भी संकट है। डिग्री पूरी होते ही ऊंची सैलरी, तेज़ प्रमोशन और ‘सम्मानजनक’ पद को पहली नौकरी का स्वाभाविक परिणाम मान लिया गया है, लेकिन कॉर्पोरेट जगत इस तर्क पर नहीं चलता। वह अपनी ज़रूरतों के अनुसार चलता है- और यहीं से असली टकराव शुरू होता है।ट

यह टकराव केवल बेरोज़गारी के आंकड़ों में दर्ज नहीं होता। इसके साथ असंतोष, हताशा और आत्म-संदेह भी जुड़ते हैं। समस्या यह नहीं कि युवा बेहतर जीवन चाहते हैं, समस्या यह है कि वे करियर की शुरुआत को ही उसके अंतिम परिणाम की तरह देखने लगते हैं। पहली भूमिका, सीमित वेतन और साधारण जिम्मेदारियां उन्हें कमतर लगती हैं, जबकि यहीं वह बिंदु होता है, जहां पेशेवर जीवन की बुनियादी समझ विकसित होती है।

नियोजकों की प्राथमिकताएं इस अंतर को और स्पष्ट करती हैं। एंट्री-लेवल पर डिग्री निर्णायक नहीं होती, उपयोगिता होती है। कंपनियां ऐसे लोगों की तलाश में रहती हैं, जो सीखने की क्षमता रखते हों, कार्य-परिस्थितियों में ढल सकें, टीम के साथ काम कर सकें और समय के साथ उत्पादक बनें। इसके विपरीत, बड़ी संख्या में स्नातक सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित रह जाते हैं। उनके पास प्रमाणपत्र होते हैं, पर कार्य-तैयारी सीमित होती है। इसी कारण या तो वे अवसरों से वंचित रह जाते हैं, या उपलब्ध अवसरों को अपने स्तर से नीचे मानकर ठुकरा देते हैं। विभिन्न रोजगार-अध्ययनों में बार-बार यह संकेत मिलता है कि संप्रेषण-कौशल, अनुकूलनशीलता और कार्यस्थल-तैयारी की कमी इस अंतर को गहरा करती है।

डिजिटल माध्यमों ने इस स्थिति को और जटिल बना दिया है। सोशल मीडिया पर सफलता का जो रूप सामने आता है, वह प्रायः चयनित और संक्षिप्त होता है। वर्षों की प्रक्रिया एक उपलब्धि में सिमट जाती है और यह सिमटा हुआ रूप ही सामान्य प्रतीत होने लगता है। परिणामस्वरूप, करियर की शुरुआती अवस्थाएं असंतोष का कारण बनती हैं। तुलना का यह ढांचा धैर्य को कम करता है और तात्कालिक उपलब्धि की अपेक्षा को बढ़ाता है।

इसी क्रम में एक और प्रवृत्ति उभरती है- हर छोटी शुरुआत को समझौता मान लेने की। एंट्री-लेवल की नौकरियां वेतन और पद के लिहाज़ से आकर्षक नहीं होतीं, लेकिन वे कार्य-जीवन की वास्तविक प्रयोगशाला होती हैं। समयसीमा का दबाव, जिम्मेदारी का बोध, टीम के भीतर भूमिका और व्यक्तिगत सीमाओं की पहचान- ये सब इसी स्तर पर स्पष्ट होते हैं। जो इस चरण को केवल ‘नीचे का स्तर’ मानते हैं, वे अक्सर उस अनुभव से वंचित रह जाते हैं, जो आगे की प्रगति के लिए आवश्यक है।

बेहतर अवसर की प्रतीक्षा स्वाभाविक है, लेकिन केवल प्रतीक्षा करना अक्सर उलटा पड़ता है। अनुभव के बिना विकल्प सीमित रहते हैं। अनुभव के साथ वही विकल्प विस्तृत होते हैं। करियर के शुरुआती चरण को टालना, दरअसल, उसे कठिन बना देता है। इस संदर्भ में ‘उचित अवसर’ की परिभाषा पर पुनर्विचार आवश्यक है- क्या वह केवल वेतन और पद से तय होती है, या उस सीख से भी, जो आगे के रास्ते को खोल सकती है।

इस पूरे परिदृश्य में शिक्षा व्यवस्था की सीमाएं भी स्पष्ट दिखाई देती हैं। विश्वविद्यालयों और उद्योगों के बीच का फासला बना हुआ है। सैद्धांतिक ज्ञान और कार्यस्थल की अपेक्षाओं के बीच जो अंतर है, उसे व्यवस्थित रूप से पाटा नहीं गया। इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप और व्यावहारिक प्रशिक्षण को अभी भी पूरक गतिविधि की तरह देखा जाता है, न कि शिक्षा के अनिवार्य हिस्से के रूप में। परिणाम यह है कि डिग्री प्राप्त करने के बाद भी बहुत-से युवा कार्य-परिस्थितियों के लिए तैयार नहीं होते। यह अंतर केवल व्यक्तिगत स्तर की समस्या नहीं है, यह संरचनात्मक है।

परिवार और समाज की भूमिका भी इस स्थिति को प्रभावित करती है। ‘पहली नौकरी कैसी है’ जैसे प्रश्न कई बार अनजाने में मूल्यांकन का रूप ले लेते हैं। यह माहौल युवा को अपने वर्तमान अवसर के मूल्यांकन के बजाय उसकी तुलना करने के लिए प्रेरित करता है। अपेक्षाएं प्रेरक हो सकती हैं, लेकिन जब वे यथार्थ से असंबद्ध हो जाती हैं, तो वे निर्णय-क्षमता को सीमित कर देती हैं।

वास्तविकता यह है कि करियर की शुरुआत प्रायः साधारण होती है। न वेतन आदर्श होता है, न भूमिका, लेकिन यही वह बिंदु होता है, जहां से दिशा बनती है। जो इस चरण को सीखने की प्रक्रिया के रूप में स्वीकार करते हैं, वे आगे चलकर अधिक सक्षम और चयनशील बनते हैं। इसके विपरीत, जो केवल ‘उचित’ अवसर की प्रतीक्षा में रहते हैं, वे अक्सर अनुभव और आत्मविश्वास- दोनों से वंचित रह जाते हैं। नौकरी-बाज़ार किसी की उम्मीदों से नहीं, अपनी शर्तों से चलता है। शुरुआत को ठुकराकर शिखर नहीं मिलता। करियर में आगे बढ़ने का रास्ता अक्सर वहीं से निकलता है, जिसे हम शुरुआत में कमतर समझ लेते हैं। (लेखक के निजी विचार हैं)

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