प्रसंगवश : जेंडर भेदभाव में कैद लड़कियों के सपने
देश आज विकास, डिजिटल इंडिया, महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की बात कर रहा है। शहरों में लड़कियां इंजीनियर, डॉक्टर, पुलिस अधिकारी और वैज्ञानिक बन रही हैं, लेकिन भारत के अनेक ग्रामीण इलाकों में आज भी हजारों लड़कियों के सपने घर की चौखट से बाहर नहीं निकल पाते। स्कूल की ड्रेस पहनकर बड़े सपने देखने वाली लड़कियों को बारहवीं के बाद अचानक यह कह दिया जाता है कि ‘अब पढ़ाई बहुत हो गई।’
कहीं आर्थिक तंगी का बहाना बनता है, तो कहीं समाज और परंपराओं का दबाव उनकी शिक्षा पर ताला लगा देता है। दूसरी ओर उसी घर के लड़कों की पढ़ाई, नौकरी और करियर के लिए हर संभव कोशिश की जाती है। यही जेंडर भेदभाव आज भी ग्रामीण भारत की सबसे बड़ी सच्चाइयों में से एक है। गांवों की बहुत सारी लड़कियां, शिक्षिका डॉक्टर या पुलिस सेवा में जाना चाहती हैं, लेकिन व्यवस्था और परिवार की मजबूरियों उनके सपनों को उड़ान से पहले ही रोक देती हैं।
एक ओर सरकार ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियान चला रही है, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में लड़कियां उच्च शिक्षा तक पहुंच ही नहीं पा रही हैं। कई रिपोर्टों में यह सामने आया है कि माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर लड़कियों का ड्रॉप आउट प्रतिशत अधिक है। लाखों ग्रामीण लड़कियों के सपने गरीबी और लैंगिक भेदभाव के बीच दम तोड़ देते हैं। आंकड़े भी इस स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। UDISE+ 2024-25 के अनुसार भारत में माध्यमिक स्तर पर लड़कियों का ड्रॉपआउट रेट लगभग 7.5 प्रतिशत है।
ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में लड़कियाँ 10वीं और 12वीं के बाद पढ़ाई छोड़ देती हैं। इसके पीछे मुख्य कारण आर्थिक कमजोरी, बाल विवाह, कॉलेजों की दूरी, सुरक्षित परिवहन की कमी और सामाजिक मानसिकता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिन घरों में लड़कियों की पढ़ाई रोकी जाती है, वहीं लड़कों की शिक्षा के लिए जमीन तक बेच दी जाती है। लड़कों को कोचिंग, मोबाइल, शहर में हॉस्टल और बेहतर संसाधन दिए जाते हैं, जबकि लड़कियों से कहा जाता है कि ‘इतनी पढ़ाई काफी है।’ यह भेदभाव केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आगे चलकर महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता, रोजगार और सामाजिक भागीदारी को भी प्रभावित करता है।
बदलाव की छोटी-छोटी किरणें भी दिखाई देती हैं। कई ग्रामीण लड़कियां कठिन परिस्थितियों के बावजूद शिक्षा जारी रखने के लिए संघर्ष कर रही हैं। स्वयं सहायता समूह, सरकारी छात्रवृत्ति योजनाएं और कुछ सामाजिक संस्थाएं भी लड़कियों को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं, लेकिन जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी, तब तक केवल योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी।
जरूरत इस बात की है कि ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च शिक्षा को लड़कियों के लिए अधिक सुलभ बनाया जाए। गांवों के पास कॉलेजों की संख्या बढ़े, सुरक्षित परिवहन उपलब्ध हो, आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को विशेष सहायता मिले और सबसे महत्वपूर्ण, परिवारों को यह समझाया जाए कि बेटी की शिक्षा कोई बोझ नहीं बल्कि भविष्य का निवेश है। अगर देश सचमुच आगे बढ़ना चाहता है, तो उसे लड़कियों की उड़ान को रोकना नहीं, बल्कि उन्हें खुला आसमान देना होगा। (यह लेखिका के निजी विचार हैं)
