संपादकीय: आशंकाओं की आहट

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
On

पेट्रोल और डीजल की कीमतों में दूसरी बार हुई बढ़ोतरी ईंधन महंगा होने की सामान्य घटना नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा संकट, भू-राजनीतिक तनाव और भारतीय अर्थव्यवस्था पर बढ़ते दबाव का साफ संकेत है। पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना कि तेल कंपनियों के नुकसान में केवल ‘एक चौथाई’ की कमी आई है, यह संकेत देता है कि यदि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं, तो आने वाले महीनों में और मूल्यवृद्धि से इनकार नहीं किया जा सकता। 2022 में पेट्रोल-डीजल के दाम 13 बार बढ़ाए गए थे। उस समय भी सरकार और तेल कंपनियों ने चरणबद्ध वृद्धि का रास्ता अपनाया था, ताकि जनता पर अचानक भारी बोझ न पड़े। इस बार भी वैसी आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। 

यदि अंतर्राष्ट्रीय बाजार में लंबे समय तक तेजी बनी रहती है, तो तेल कंपनियां घाटे की भरपाई के लिए धीरे-धीरे कीमतें बढ़ा सकती हैं। इसका प्रभाव पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं होगा, इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था की लागत संरचना पर पड़ेगा। ट्रक और टेंपो का किराया बढ़ेगा, कृषि उपज, फल, सब्जियां, राशन और उपभोक्ता वस्तुओं की बड़ी आपूर्ति सड़क परिवहन पर निर्भर है, तो डीजल महंगा होने से दूसरे राज्यों से आने वाली वस्तुओं की लागत बढ़ेगी और उसका बोझ अंततः उपभोक्ता पर पड़ेगा। 

ईंधन की महंगाई खाद्य मुद्रास्फीति को जन्म देगी। स्कूल बसें, ऑटो, टैक्सी और निजी बस ऑपरेटर ईंधन लागत बढ़ने का भार यात्रियों पर डालने की कोशिश करेंगे। इसका सीधा असर मध्यम वर्ग और निम्न आय वर्ग की मासिक आय पर पड़ेगा, क्योंकि परिवहन व्यय घरेलू बजट का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ट्रैक्टर, पंपिंग सेट और सिंचाई का बड़ा हिस्सा डीजल आधारित है, तो खेती की लागत बढ़ेगी,  किसानों का मुनाफा कम होगा। भारत में ही नहीं इंडोनेशिया, वियतनाम, पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों में ईंधन भंडार तेजी से घट रहे हैं। कहीं ब्लैकआउट है, कहीं पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें। 

पाकिस्तान और श्रीलंका पहले ही दिखा चुके हैं कि ऊर्जा संकट किस तरह राजनीतिक और सामाजिक अस्थिरता में बदल सकता है। भारत की स्थिति इन देशों से अपेक्षाकृत बेहतर अवश्य है, क्योंकि यहां विदेशी मुद्रा भंडार, रणनीतिक तेल भंडार और बड़ी अर्थव्यवस्था का सहारा मौजूद है। फिर भी हम पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। यदि तेल लंबे समय तक महंगा रहता है, तो चालू खाते का घाटा बढ़ेगा, रुपये पर दबाव पड़ेगा और महंगाई नियंत्रण कठिन हो जाएगा। यही कारण है कि प्रधानमंत्री द्वारा पेट्रोल, गैस और डीजल के संयमित उपयोग की अपील केवल नैतिक सलाह नहीं, बल्कि दूरदर्शी चेतावनी मानी जानी चाहिए। 

ऊर्जा संकट के इस दौर में ईंधन बचत अब केवल व्यक्तिगत अर्थशास्त्र नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा का प्रश्न बन चुकी है। भारत के सामने चुनौती केवल तेल खरीदने की नहीं, बल्कि वैकल्पिक ऊर्जा, सार्वजनिक परिवहन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और ऊर्जा दक्षता को तेज गति से बढ़ाने की भी है। जाहिर है कि ऊर्जा पर अत्यधिक आयात निर्भरता हमारी अर्थव्यवस्था की बड़ी कमजोरी बन सकती है। हमें भविष्य की महंगाई और वैश्विक अस्थिरता से बचना है, तो अब ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में कहीं अधिक तेज और निर्णायक कदम उठाने ही होंगे।