प्रत्याहार: अंत: करण की यात्रा का आरंभ द्वार

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Published By Anjali Singh
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मानव सहित सभी प्राणी देह और आत्मा के अंतर संबंध तथा इस अंतर संबंध की अंतहीन यात्रा के पथिक मात्र हैं, जिनकी विश्रामस्थली का आरंभ द्वार प्रत्याहार है। इंद्रियां और मन मानव के दो ऐसे अंग हैं, जो मनुष्य को, उसके कार्य कलाप को, उसके मनोभाव को अथवा संक्षेप में या कहें कि उसके संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्धारक है। इंद्रियां और मन चलायमान है। यही दोनों मनुष्य को पाथेय प्रदान करते हैं। इन दोनों पर नियंत्रण रखना आवश्यक है। इस हेतु इंद्रियनिग्रह एवं मनोनिग्रह को अनिवार्य माना गया है। प्रत्याहार का अभ्यास इसका सटीक उदाहरण है। यह इंद्रिय और मन को नियंत्रित रखता है और इनको विचलित करने वाली विषय वासनाओं से मुक्त रखकर मनुष्य की ऊर्जा का प्रवाह सही दिशा में रखने में सहायक होता है। मनुष्य की शक्ति का अपव्यय नहीं होता है। यह व्यवस्था अंतस की यात्रा के लिए अनिवार्य एवं अपेक्षित है।

मनुष्य और परमात्मा का रहस्य 

ब्रह्मबिन्दुपनिषद (2) में लिखा है  ‘मन एव मनुष्यानां कारणं बंधमोक्षयो। बंधाय बिषयासक्तः मुक्तयै निरविषयम स्मृतम। अर्थात मन  ही सभी मनुष्यों के बंधन एवं मोक्ष का कारण है। विषयों में आसक्त मन बंधन का और कामना-संकल्प से रहित मन ही मोक्ष अथवा मुक्ति का कारण कहा  गया है। प्रत्याहार ही मानव को इस मार्ग का द्रष्टा बनकर मुक्तिद्वार की ओर अग्रसर होने को प्रेरित करता है और यही अंतस की यात्रा का आरंभ है। मनुष्य के साथ महिमा आती है, क्योंकि मनुष्य के पीछे गहरे में परमात्मा छिपा है। मनुष्य मंदिरों के बिना नहीं रह सकता है, चर्चों, मस्जिदों के बिना नहीं रह सकता है, क्योंकि मनुष्य स्वयं एक मंदिर है। मनुष्य अपने परमात्मा के प्रति श्रद्धा भाव से भरा हुआ है। मनुष्य परमात्मा के बिना नहीं रह सकता, क्योंकि गहरे में वह स्वयं परमात्मा है। मनुष्य और परमात्मा इन दोनों के बीच एक सेतु है- पदार्थ और मन के बीच, इस संसार और उस संसार के बीच, क्षणभंगुर और सनातन के बीच, जीवन और मृत्यु के बीच एक सेतु है। यही सौंदर्य भी है- मनुष्य  और परमात्मा के रहस्य का, उनके मध्य ऊपजे विरोधाभास का। अतएव मनुष्य कोई पहेली नहीं है, अपितु मनुष्य एक रहस्य है। प्रत्याहार इसी रहस्य की खोज है, जो अंतस या अन्त: करण की यात्रा का आरंभ है।  

प्रत्याहार की साधना

प्रत्याहार योग के पांचवें अंग ‘धारणा’ से पहले आता है, जिसका अर्थ है अपनी चंचल इंद्रियों (आंख, कान, जीभ, आदि) को बाहरी विषयों (रूप, रस, गंध, आदि) से हटाकर मन और आत्मा की ओर मोड़ना या एकाग्र करने का अभ्यास है। जब आंखें देखना बंद कर दें, कान सुनना बंद कर दें और मन किसी एक बिंदु पर केंद्रित हो जाए, तो यह प्रत्याहार का अभ्यास है, जो ध्यान की ओर ले जाता है। प्रत्याहार का अर्थ है इंद्रियों को बाहरी विषयों से हटाकर अंतर्मुखी करना, जो अष्टांग योग का पांचवां चरण है, यह आंतरिक यात्रा की शुरुआत है, जहां मन बाहरी दुनिया के प्रभावों से मुक्त होकर स्वयं के भीतर एकाग्र होने लगता है, जिससे धारणा, ध्यान और समाधि जैसे उच्च यौगिक चरणों के लिए मार्ग प्रशस्त होता है। यह इंद्रियों पर नियंत्रण स्थापित करने और उन्हें विषयों से विमुख करने की प्रक्रिया है, जिससे व्यक्ति अपनी आंतरिक ऊर्जा को केंद्रित कर सके। 

आंतरिक यात्रा का  तात्पर्य है - मेरा शरीर, मेरा मन, मेरी इन्द्रियां, मेरी बुद्धि व चित्त यानी कि स्थूल, सूक्ष्म व कारण-तीनों ही शरीर इस संसार के विषयों, संसार की चकाचौंध, राग-द्वेष, हिंसा-घृणा, कलह-क्लेश, मोह-ममता आदि में रमे हुए हैं, तो कैसे इन तीनों शरीरों को इन बुराइयों से हटाकर अच्छाई, परोपकार व परमार्थ की ओर लगाएं-बस, इसको सिद्ध करने के लिए जो साधन अपनाया जाता है, वही प्रत्याहार है। अपने भीतर सांसारिक वस्तुओं और विषयों के प्रति त्याग की प्रकृति विकसित करना भी प्रत्याहार की साधना है। यह संतोष अपनाने से संभव होता है। महर्षि पतंजलि ने संतोष को परम सुख बतलाया है- “संतोषाद अनुत्तम॑ सुख लाभ:”। त्याग से मिलने वाला सुख संग्रह के मुकाबले बड़ा होता है। बहुत धनलाभ होने पर भी वह सुख प्राप्त नहीं होता, जो किसी वास्तविक जरूरतमंद को थोड़ा-सा धन दे देने पर प्राप्त होता है। ईशोपनिषद का प्रथम श्लोक शिक्षा देता है-“तेनत्यक्तेन भुंजिथा” अर्थात् त्यागपूर्वक भोग करो। यही प्रत्याहार की साधना है। 

चित्त को ध्येय में लगाना

महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र के साधनपाद के 54वें सूत्र में बताते हैं – “स्वविषया सम्प्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां ग्रत्याहार:” अर्थात् साधनाकाल में साधक इन्द्रियों के विषयों को त्याग करके अपने चित्त को ध्येय में लगाता है। उस समय इन्द्रियों का अपने विषयों की ओर न जाकर चित्त में विलीन-सा हो जाना प्रत्याहार है और प्रत्याहार सिद्ध हो जाने पर साधक की इन्द्रियाँ पूरी तरह उसके वशीभृत हो जाती हैं। “तत: परमावश्यत इन्द्रियाणाम्।” प्रत्याहार की साधना के सूत्र: आत्म-चिंतन, आत्म-निरीक्षण, होश-पूर्वक जीना है। यह मानव के अंतस की यात्रा का आरंभ है। प्रत्याहार मनुष्य को अंदर से जानने की प्रक्रिया है। मनुष्य को बाहर से जानने का कोई उपाय नहीं है। यदि तुम मनुष्य को बाहर से जानने की कोशिश करते हो, जैसा कि वैज्ञानिक करते हैं, तो हम  गलती करेंगे। मनुष्य को जानने का एकमात्र उपाय उस मनुष्य को जानना है, जो हमारे भीतर है। मनुष्य को सीधा-सीधा जानने का एकमात्र उपाय है स्वयं का साक्षात्कार करना और यह प्रत्याहार के द्वारा संभव है।  हम अपने भीतर एक विराट शक्ति लिए हुए हैं,  जब तक उससे हमारी पहचान न हो जाए, हम उसे बाहर दूसरों में नहीं देख पाएंगे और नहीं पहचान पाएंगे। इसे एक कसौटी की भांति ख्याल में ले लेना होगा कि जितना हम  स्वयं को जानते है  उतना ही हम  दूसरों को जान सकते है। उससे रत्ती भर ज्यादा नहीं। बिल्कुल नहीं- असंभव है यह बात। पहले जानने वाले को जानना होता है, केवल तभी दूसरे के रहस्य में उतरा जा सकता है। हमें  पहले अपनी गहराई में उतरना होता है, केवल तभी हमारी आंखें दूसरों की गहराई को पहचानने में सक्षम होती हैं।

ओशो ने कहा है “यदि तुम अपनी परिधि पर रहते हो तो सारा अस्तित्व उथला मालूम होगा। यदि तुम सोचते हो कि तुम सागर की एक लहर हो, और सागर से तुम्हारा कोई परिचय नहीं है, तो बाकी लहरें भी लहरें ही रहेंगी। जब तुम अपने भीतर उतरते हो और जान लेते हो कि तुम सागर हो, तुम सदा सागर ही रहे हो, तुम्हें बस जानना है, तो बाकी सब लहरें भी खो जाती हैं, अब केवल सागर ही लहरा रहा होता है। अब प्रत्येक लहर के पीछे सुंदर कि असुंदर, छोटी कि बड़ी, उससे कुछ फर्क नहीं पड़ता प्रत्येक लहर के पीछे सागर ही लहराता है।”


-प्रो. रज्जन कुमार 

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