बोध कथा : समय की कीमत
एक समय की बात है, एक बहुत ही समृद्ध राज्य में एक राजा रहता था। उसके पास सब कुछ था, लेकिन उसे एक अजीब जिज्ञासा थी- वह ‘समय की असली कीमत’ को साक्षात देखना चाहता था। एक दिन एक बूढ़ा मूर्तिकार राजदरबार में आया। उसने राजा को एक अनोखी भेंट दी: दो कांच के कलश।
पहला कलश: इसमें दुनिया के सबसे कीमती हीरे-जवाहरात भरे थे।
दूसरा कलश: इसमें साधारण समुद्र की रेत भरी थी। मूर्तिकार ने कहा, “महाराज, ये दोनों कलश जादुई हैं। पहले कलश से आप जब चाहें एक हीरा निकाल सकते हैं, लेकिन वह तभी निकलेगा जब आप दिन का एक घंटा किसी सार्थक कार्य (जैसे दान, सेवा या शिक्षा) में लगाएंगे। दूसरे कलश की रेत हर घंटे अपने आप गिरती रहेगी, चाहे आप कुछ भी करें या न करें।” राजा मुस्कुराया और बोला, “यह तो बहुत सरल है। मैं हीरों वाले कलश पर ध्यान दूंगा।”
महीने बीतते गए। राजा ने हीरों के लालच में बहुत से अच्छे काम किए- वैद्यशालाएं बनवाए, बाग लगवाए। उसे लगा कि वह बहुत सफल हो रहा है, लेकिन एक दिन उसने देखा कि हीरों वाला कलश अभी भी आधा भरा हुआ है, जबकि रेत वाला कलश लगभग खाली हो चुका है।
राजा घबराकर मूर्तिकार के पास गया और बोला, “मेरे पास अभी भी बहुत सारे हीरे बाकी हैं, फिर रेत खत्म क्यों हो रही है?” मूर्तिकार ने शांत स्वर में उत्तर दिया: “महाराज, हीरे आपके ‘कर्म’ हैं और रेत आपका ‘जीवन’। आपने हीरों (उपलब्धियों) को इकट्ठा करने में इतना समय लगा दिया कि आप यह भूल गए कि रेत (समय) का गिरना हीरों के निकलने पर निर्भर नहीं है। आप कर्म करके हीरे तो कमा सकते हैं, लेकिन उन हीरों से गिरे हुए रेत के दानों को वापस कलश में नहीं डाल सकते।”
राजा को बोध हुआ कि वह उपलब्धियों की गिनती कर रहा था, जबकि जीवन की सादगी को जीना भूल गया था। उसने समझा कि समय केवल ‘उपयोग’ करने के लिए नहीं है, बल्कि हर पल को ‘महसूस’ करने के लिए भी है। इस कथा की सीख है कि अक्सर हम अपनी उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं को सहेजने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि हम यह भूल जाते हैं कि समय एक ऐसा संसाधन है, जो हमारे किसी भी प्रयास के बिना भी खर्च हो रहा है। श्रेष्ठ कर्म करना अनिवार्य है, लेकिन जीवन के हर क्षण का आनंद लेना और वर्तमान में जीना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।
