समरसता के अग्रदूत कबीर
भारतीय संत परंपरा में कबीरदास का स्थान अत्यंत ऊंचा और विशिष्ट है। वे केवल भक्तिकालीन कवि ही नहीं, अपितु एक ऐसे सामाजिक चिंतक भी थे, जिन्होंने अपने समय की धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विसंगतियों पर तीखा प्रहार किया। कबीर की वाणी में समरसता का जो भाव मिलता है, वह भारतीय समाज के लिए आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उनके समय में था। समरसता का अर्थ है- समानता, सामंजस्य और परस्पर प्रेम का भाव। कबीर ने जाति, धर्म, पंथ, ऊँच-नीच के भेदों को नकारते हुए मानवमात्र की एकता का संदेश दिया।
कबीरदास जी का प्राकट्य (काशी में ज्येष्ठ पूर्णिमा सन् 1398 ई.) ऐसे समय में हुआ, जब भारतीय समाज अनेक प्रकार के विभाजनों से ग्रस्त था। एक ओर हिन्दू समाज में जाति-पांति का कठोर बंधन था, तो दूसरी ओर मुस्लिम समाज में भी धार्मिक कट्टरता व्याप्त थी। दोनों समुदायों के बीच वैमनस्य और संदेह की दीवारें खड़ी थीं। ऐसे समय में कबीर ने निर्भीकता से दोनों पक्षों की कुरीतियों पर प्रहार किया और समरस समाज की स्थापना का आह्वान किया।
कबीर की दृष्टि में सबसे बड़ा धर्म ‘मानवता’ है। वे किसी भी प्रकार के बाह्य आडंबर या धार्मिक कर्मकांड को महत्व नहीं देते। उनके अनुसार, सच्चा साधक वही है जो सभी में एक ही परमात्मा का दर्शन करे। जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।। कबीर कहते हैं कि मनुष्य की पहचान उसकी जाति या बाहरी रूप से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान और गुणों से होनी चाहिए। यह समरसता का अत्यंत सशक्त संदेश है, जो सामाजिक समानता की ओर इंगित करता है।
कबीर ने बाहरी पूजा-पाठ, मंदिर-मस्जिद के दिखावे और कर्मकांडों को निरर्थक बताया। उनका मानना था कि सच्ची भक्ति मन की शुद्धता में है। वे कहते हैं कि हिन्दू और मुसलमान में कोई भेद नहीं है- हिन्दू तुरक एक रहा है, सद्गुर इहै बताई।। वे समझाते हैं कि ब्राह्मण और शूद्र में एक ही जैसा रक्त है, उसका एक ही रंग है, सब ईश्वर की संतान हैं, उनमें न कोई छोटा है, न बड़ा।
कबीर के भजन और दोहे आज भी हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों में समान रूप से गाए जाते हैं। उनकी वाणी ने साहित्य, संगीत और लोकजीवन पर गहरा प्रभाव डाला है। कबीरपंथी परंपरा आज भी उनके विचारों को जीवित रखे हुए है।आज का समाज भी कई प्रकार के विभाजनों से जूझ रहा है—जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र आदि के आधार पर भेदभाव अभी भी विद्यमान है। ऐसे समय में कबीर की वाणी हमें एकता और समरसता का मार्ग दिखाती है।
आज हम कबीरदास की 659 वीं जयंती (29 जून, 2026) मना रहे हैं, तो हम संकल्प लेकर सभी भेदभावों से ऊपर उठकर एक समरस समाज की स्थापना करें, जहां सभी मनुष्य समान हों और परस्पर प्रेम एवं सम्मान के साथ जीवनयापन करें। कबीरदास न केवल एक महान संत और कवि थे, अपितु एक ऐसे सामाजिक सुधारक भी थे, जिनकी वाणी युगों-युगों तक मानवता को दिशा देती रहेगी।
