खतरे में समुद्र के भीतर बिछा डिजिटल जाल
हाल ही में ईरान-अमेरिका युद्ध के दौरान अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी के विरोध में ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर के नीचे बिछी वैश्विक इंटरनेट की फाइबर ऑप्टिक केबलों को काटने की धमकी देकर पूरी दुनिया को सकते में डाल दिया था। यही नहीं, ईरान ने अपनी समुद्री सीमा से गुजरने वाले डेटा ट्रैफिक के लिए बड़ी टेक कंपनियों से सालाना टोल टैक्स वसूलने की चेतावनी देकर नया संकट पैदा कर दिया था।
दुनिया का करीब 97 प्रतिशत डिजिटल डेटा ट्रांसफर इन्हीं समुद्री केबलों के जरिए होने के कारण ईरान की धमकी से इंटरनेट ब्लैकआउट होने का जोखिम खड़ा हो गया था। यदि ये केबलें कट जातीं तो एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बीच संचार व्यवस्था पूरी तरह ठप हो जाती। इसके साथ ही सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत और बहरीन जैसे खाड़ी देश जिनकी डिजिटल अर्थव्यवस्था होर्मुज के नेटवर्क पर टिकी है, धड़ाम हो जाती।
भारत का करीब 60 प्रतिशत इंटरनेट ट्रैफिक मिडिल ईस्ट के रास्ते ही पश्चिम और यूरोप जाता है। ऐसे में देश में इंटरनेट भले बंद नहीं होता, लेकिन वेबसाइट्स, शेयर ट्रेडिंग, क्लाउड सेवाएं और ऑनलाइन भुगतान की गति धीमी पड़ जाती। जाहिर है, इन स्थितियों में सुमद्री केबल को निशाना बनाना अस्पष्ट रूप से लड़े जाने वाले युद्ध जैसा है, क्योंकि यह साबित करना बड़ा कठिन होता है कि किसी देश ने जान-बूझकर केबल काटी होंगी। ऐसे में जबकि संचार के लिए दुनिया इन केबल पर बहुत अधिक निर्भर है, इसलिए इस व्यवस्था को भरोसेमंद बनाने के साथ सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अगर परमाणु अप्रसार संधि जैसी नीति की जरूरत से इंकार नहीं किया जा सकता है, तो डेटा प्रसारण के नए माध्यम विकसित करना भी बेहद जरूरी है।
170 साल में कितनी बदल गई दुनिया
दुनिया में सबसे पहले ब्रिटेन और अमेरिका के बीच अटलांटिक महासागर में टेलीग्राफ की तांबे की तार बिछाई गई थी। इसके जरिये 1858 में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स बुकानन को बधाई संदेश भेजा था, तब इस तार को प्रसारित करने में करीब 16 घंटे लग गए थे। लेकिन आज समुद्र में बिछी फाइबर ऑप्टिक केबल प्रति सेकंड 60 करोड़ घंटे के एचडी वीडियो के बराबर डेटा दुनिया भर में भेज सकती हैं।
सुरक्षा के लिए संधियां तो हैं, पर लागू करना मुश्किल
समुद्र में बिछी केबल की सुरक्षा के लिए कई अंतर्राष्ट्रीय संधियां हैं, लेकिन उन्हें लागू करना मुश्किल है। पिछले वर्ष बाल्टिक सागर में बिछी केबल को निशाना बनाने की कई वारदातें हुई थीं। ऐसी घटनाओं से इंटरनेट सेवा बाधित होने से रोकने के लिए कई जगहों पर वैकल्पिक केबल डाली गई हैं, लेकिन ऐसा हर जगह नहीं है। भारत के पास 18 ट्रांस-ओशिएनिक केबल अर्थात महासागर केबल हैं। इसमें से अधिकरत मुंबई के वर्सोवा बीच के पास छह किमी दायरे में फैले हैं।
इस तरह बिछाई जाती फाइबर ऑप्टिक केबल
समुद्र में बिछी जो फाइबर ऑप्टिक केबल तटों के करीब होती हैं, उन पर मजबूत कवच होता है, लेकिन समुद्र की गहराई में बिछी केबल पर ऐसा कवच नहीं होता है। इन्हें समुद्र में बिछाने के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए केबल-लेइंग शिप्स का उपयोग किया जाता है। ऐसे जहाजों पर हजारों टन केबल लपेटकर रखी जाती है। इससे केबल का एक छोर लेकर छोटा जहाज पूर्व निर्धारित मार्ग पर आगे बढ़ता है, और निश्चित तनाव के साथ केबल छोड़ता जाता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जाए कि केबल सीधी लाइन में बिछ रही है। इस प्रक्रिया में समुद्र के उथले पानी में ट्रेंचिंग डिवाइस से केबल डाली जाती है। यह उपकरण आधा या एक मीटर गहरी खोदाई करके खंदक में केबल बिछाने का रास्ता साफ करता है। हर रूट पर कई केबल बिछाई जाती हैं, ताकि अगर कोई केबल क्षतिग्रस्त हो जाए तो दूसरी केबल से डेटा प्रसारण जारी रहे।
समुद्र के तटों पर जहाजों के लंगर से टूटती रहती हैं केबल
फाइबर ऑप्टिक केबल बनाने और इन्हें बिछाने के काम में चीन, अमेरिका, इटली और फ्रांस की कंपनियां आगे हैं। इस केबल प्रणाली को बढ़ाने और बरकरार रखने के लिए इन्हें समुद्र तट पर लाना पड़ता है, जिसे लैंडिंग स्टेशन कहते हैं। बिना लैंडिंग स्टेशन के यह केबल किसी काम की नहीं होती। हर साल केबल टूटने की औसतन 200 घटनाएं होती हैं। इनमें से ज्यादातर समुद्र तट के पास ही होती हैं, वहां पानी गहरा नहीं होने से अक्सर जहाजों के लंगर में फंसने से केबल टूट जाती हैं। तटों पर केबल मरम्मत के लिए नौकाएं हमेशा तैयार रहती हैं, जहां केबल टूटती है, वहां इंजीनियर उसे समुद्र तल से ऊपर उठा कर दोबारा जोड़ देते हैं। लेकिन सरकारों के सामने हमलों से केबल की सुरक्षा करने की चुनौती लगातार बढ़ रही है। कई यूरोपीय देश उन नौकाओं को जब्त कर रहे हैं, जो संदिग्ध दिखती हैं। नाटो देश पहले ही कह चुके हैं कि अगर कोई जानबूझकर समुद्र में बिछी केबल को निशाना बनाता है, तो उसे गंभीरता से लिया जाएगा।
सैटेलाइट बढ़िया विकल्प पर बेहतर और किफायती नहीं
डेटा प्रसारण का दूसरा विकल्प अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट हैं। हालांकि ये समुद्र में बिछी फाइबर ऑप्टिक केबलों की तुलना मंं बहुत कम मात्रा में डेटा प्रसारित करते हैं और अधिक मंहगे भी हैं। लेकिन सैटेलाइट से डेटा ट्रांसमिशन अब तेज हो रहा है। धरती के करीब या निचली कक्षा में तैनात ऐसे सैटेलाइट का सबसे बढ़िया उदाहरण स्टारलिंक है। इसे एलन मस्क की कंपनी स्पेस एक्स संचालित करती है। पृथ्वी की निचली कक्षा में तैनात इस कंपनी के हजारों सैटेलाइट इंटरनेट डेटा का प्रसारण करते हैं। आगे जैसे-जैसे अन्य कंपनियां अपने सैटेलाइट अंतरिक्ष में तैनात करेंगी, इस माध्यम की ओर रुझान बढ़ेगा, लेकिन समुद्र में बिछी डेटा केबल दुनिया में डेटा प्रसारण का मुख्य माध्यम बनी रहेंगी। इसकी वजह, फिलहाल इससे बेहतर और किफायती विकल्प नहीं होना है।
