प्रसंगवश : बढ़ते तापमान के साथ ऑरेंज और रेड अलर्ट
भारत के कई हिस्सों, विशेषकर उत्तर प्रदेश और दिल्ली में भीषण ‘लू’ का ऑरेंज और रेड अलर्ट जारी किया गया है। तापमान 45 से 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच रहा है। लोगों को दोपहर 11 बजे से शाम 4 बजे तक घर के अंदर रहने की सलाह दी जा रही है। इतनी अधिक गर्मी, स्नान आदि के लिए प्लास्टिक की टंकी का पानी खौल रहा है। घरों से न निकलने की एडवायजरी जारी है, जो किसान, मजदूर और सुरक्षाकर्मियों के लिए शायद संभव नहीं है।
लू लगने के प्रारंभिक संकेत चक्कर, मिचली, उल्टी, सिर दर्द, अत्यधिक प्यास, पेशाब थोड़ा व गहरे रंग का होना, कमजोरी और दिल की धड़कन तेज होना आदि हैं। भ्रम, वाणी की अस्पष्टता, बेचैनी, दौरे पड़ना या बेहोशी, उच्च तापमान (40 डिग्री सेल्सियस) आदि गंभीर चेतावनी के लक्षण हैं।
ऐसी दशा में रोगी को तत्काल प्राथमिक उपचार हेतु चिकित्सालय में भर्ती करा देना चाहिए। वहां पहुंचने तक रोगी के सिर, गर्दन, बगल और जांघों के आसपास बर्फ की पैक या ठंडे, गीले तौलिए रखें। हीट स्ट्रोक यानी लू लगना एक चिकित्सीय आपातस्थिति है, जिसमें सामयिक उपचार बहुत आवश्यक है। वैसे यह आम धारणा है कि गर्मी से सुरक्षा घर से शुरू होती है। तात्पर्य यह है कि पहले से सतर्क रहने पर हीट स्ट्रोक से बचा जा सकता है।
दोपहर में छायादार जगह रहना और पर्याप्त पानी पीते रहना आवश्यक है। जरूरी कार्य के लिए सुबह, शाम बाहर निकले, जिससे धूप के सीधे प्रभाव से बच सके। पर्याप्त मात्रा में पानी, नींबू पानी, छाछ और ओआरएस का सेवन करें। हल्के रंग के ढीले सूती कपड़े पहनें। सिर को गमछा से ढककर रखें। पानी से भरपूर मौसमी फल और सब्जियों का सेवन करें। हीट स्ट्रोक की दशा में अल्कोहल और कार्बनिक पेय न लें। शिशु, बाल-वृद्ध और गर्भवती महिलाओं के साथ ही हृदय, श्वसन और गुर्दा के रोगियों को हीट स्ट्रोक से विशेष रूप से बचना चाहिए।
‘लू’ का सबसे सामान्य अर्थ गर्मियों में चलने वाली अत्यधिक गर्म, शुष्क और धूल भरी हवा से है। इसके दुष्प्रभाव को ‘लपट’ या ‘तपन’ भी कहा जाता है, जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक इस गर्म हवा या तेज धूप के संपर्क में आता है, तो शरीर का तापमान अचानक बढ़ जाता है और निर्जलीकरण हो जाता है। इसे ‘हीटस्ट्रोक’ भी कहते हैं।
मानव शरीर अपने आंतरिक तापमान को थर्मोरेगुलेशन नामक प्रक्रिया द्वारा नियंत्रित करता है, जो मुख्य रूप से मस्तिष्क में स्थित हाइपोथैलेमस से संचालित होती है। यह एक अंतर्निर्मित थर्मोस्टेट की तरह कार्य करता है, जो त्वचा और आंतरिक अंगों में स्थित सेंसरों का उपयोग करके शरीर के तापमान की तुलना औसत तापमान 37 डिग्री सेल्सियस (98.6 डिग्री एफ) से लगातार करता रहता है।
शरीर का तापमान इससे ऊपर बढ़ने पर, तंत्र सक्रिय कर देता है। त्वचा के पास की रक्त वाहिकाएं चौड़ी हो जाती हैं, जिससे गर्म रक्त सतह के करीब आ जाता है और गर्मी विकिरण से बाहर निकल जाती है। पसीना के वाष्पीकरण से भी शरीर ठंडा हो जाता है, लेकिन लंबे समय तक खुले धूप में रहने पर शरीर की यह व्यवस्था अपेक्षित काम नहीं करती है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
