गर तोप मुकाबिल हो, अखबार निकालो
भारत में अखबार तो 1780 से निकलने लगे थे। पहला अखबार ‘बंगाल गजट’ 29 जनवरी 1780 को जेम्स ऑगस्टन हिक्की ने अंग्रेजी भाषा में निकाला था। इसीलिए इसको Hicky’s Bengal Gazette भी कहते थे। इस पहले अखबार के आने के फौरन बाद फारसी और बांग्ला में भी अखबार भी बाजार में आ गए। किंतु हिंदी की देवनागरी लिपि में मुद्रण की कोई व्यवस्था तब कलकत्ता में भी नहीं थी। कोई छापाखाना ऐसा नहीं था, जिसमें देवनागरी के अक्षरों को कंपोज किया जा सके। आखिरकार 1826 तक एक जुनूनी पत्रकार पंडित जुगुल किशोर शुक्ल और उनके साथी मन्नू ठाकुर ने ऐसे छापाखाने का जुगाड़ कर ही लिया। इन लोगों ने 16 फरवरी 1826 को अखबार निकालने का लाइसेंस प्राप्त किया और अंततः 30 मई 1826 के दिन पहला हिंदी साप्ताहिक अखबार ‘उदंत मार्तंड’ प्रकाशित होकर पाठकों कर बीच पहुंचा। यह साप्ताहिक अखबार हर मंगलवार को प्रकाशित होता था।
अखबार जनता की आवाज
मूल रूप से कानपुर के निवासी पंडित जुगुल किशोर शुक्ल पेशे से वकील थे और कलकत्ता की दीवानी अदालत में प्रोसेडिंग रीडर थे। ठीक-ठाक कमाई थी, किंतु उनके दिमाग में एक अखबार निकालने की योजना घर कर गई। उनके विचार से उनके युग में अखबार ही अकेला माध्यम था, जिसके जरिए आम जनता अपनी पीड़ा हुक्मरानों तक पहुंचा सकती है। वे यह भी समझ रहे थे कि उत्तर भारत के विशाल हिंदी समाज को जोड़ने के लिए अखबार निकालना सबसे सशक्त मंच है। पर उस समय ईस्ट इंडिया के हुक्मरान अपनी दमनकारी नीतियों को अपने क्षेत्र में तो लागू कर ही रहे थे, देशी रजवाड़ों पर भी पैनी निगाह रखे थे। उनका इरादा इन रियासतों को हड़पना भी था। ऐसे में कलकत्ता का हिंदी अखबार उनके रास्ते में रोड़ा बन जाता। इसलिए वे नहीं चाहते थे कि हिंदी अखबार निकले। इसीलिए उन्होंने उदंत मार्तंड को डाक शुल्क में कोई छूट नहीं दी। ताकि अखबार का दायरा सीमित रहे।
बड़ी सोच वाले पंडित जुगुल किशोर शुक्ल
कलकत्ता का हिंदी भाषी समाज बहुत गरीब था। वह अखबार को मदद करना तो दूर अखबार की कीमत भी देने को राजी नहीं था। इसलिए डेढ़ वर्ष में ही चार दिसंबर 1827 को आखिरी अंक निकलकर इसे बंद करना पड़ा। इस साप्ताहिक अखबार के आखिरी अंक में शुक्ल जी पीड़ा के साथ लिखा कि उगते सूर्य (उद्दंत मार्तंड) को भारी मन से अब अस्त करना पड़ रहा है। परंतु शुक्ल जी ने जो अलख जगाई थी वह अपनी बुझी हुई लौ की राख से बार-बार उमगता रहा। आज 200 वर्षों के इस सफर हिंदी पत्रकारिता ने वह दौर भी छुआ, जब देश की किसी भी भाषा के अखबार की आवाज उतनी व्यापक नहीं थी, जितनी हिंदी अखबारों की थी। पंडित जुगुल किशोर शुक्ल हिंदी और संस्कृत के अतिरिक्त अंग्रेजी, फ्रेंच, पारसी, बांग्ला आदि भाषाओं के भी विद्वान थे, इसलिए उनकी समझ बहुत व्यापक थी।
अखबार निकालने के खर्चे का अनुमान नहीं लगा सके शुक्ल जी-
उस समय तक बिहार और उत्तर प्रदेश का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजों के पास चला गया था। दिल्ली के बादशाह शाह आलम के साथ 1764 में बक्सर में जो संधि हुई, उसके चलते वह 40 हजार वर्ग मील का इलाका खो बैठा। उधर अवध का साम्राज्य भी कमजोर पड़ रहा था। अतः इन सब इलाकों में अंग्रेजों ने अपनी बंदोबस्त प्रणाली लागू की और यहां के किसान कलकत्ता मजदूरी के लिए पहुंचने लगे। बड़ा बाजार ही उनका ठिकाना था। इसके अलावा भारत की इस राजधानी में राजस्थान के मारवाड़ी सेठ और पंजाब के खत्री व्यापारी पहुंचे। इन सबने शुक्ल जी से अखबार निकालने का दबाव डाला। क्योंकि उनके बीच जुगुल किशोर शुक्ल काफी पढ़े-लिखे और चलते-पुर्जे व्यक्ति माने जाते थे। मगर शुक्ल जी ने अखबार तो निकाला उसके खर्च के मॉडल को नहीं समझा। उन्होंने पाठकों से चंदा और उदंत मार्तंड की कीमत से ही खर्च निकालने की सोची थी। बस यहीं उनसे चूक हो गई।
गवर्नर जनरल की हिल गई थी कुर्सी
उदंत मार्तंड जब निकला, तब तक हिंदी का आधुनिक स्वरूप उभरकर नहीं आया था। हिंदी तब बोलियों का मिश्रण थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बोली जाने वाली खड़ी बोली को ही हिंदी भाषा का मानक रूप बनाया जा रहा था। इसमें ब्रज का भी पुट रहता इसलिए उदंत मार्तंड जिस भाषा में निकला उसमें खड़ी बोली, ब्रज और अवधी का भरपूर मिश्रण था। इसके पहले अंक की 500 प्रत्तियां प्रकाशित हुईं। शुक्ल जी आधुनिक विचारों वाले और यूरोपीय मेधा से भली-भांति परिचित थे। यूरोप की औद्योगिक क्रांति का असर तो उनके ऊपर था ही। इसके अलावा Hicky’s Bengal Gazette ने जिस तरह से गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग की कुर्सी हिला दी थी, उस ताकत को भी शुक्ल जी समझते थे।
भारी डाक शुल्क रोड़ा बना
मध्य वर्ग के लिए अखबार एक जरूरत बना। इसी मकसद से उदंत मार्तंड का प्रकाशन शुरू हुआ था। उस समय के सामाजिक सुधारों, स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रवाद जगाने और ब्रिटिश दमनकारी नीतियों के खिलाफ यह एक महत्वपूर्ण आवाज बना। इस साप्ताहिक अखबार में शहर की गतिविधियां भी छपती थीं और उस समय की वैज्ञानिक खोजों और आधुनिक जानकारियों को भी महत्व दिया जाता था। इसके अलावा इसके वहां रहने वाले हिंदी भाषियों में देश से जुड़े विभिन्न मुद्दों के प्रति चेतना विकसित करना भी था। लिहाजा पत्रिका को हिंदी भाषी क्षेत्रों में भेजने के बारे में सोचा गया, लेकिन भारी डाक शुल्क उनके आड़े आ रहा था। उन दिनों सरकारी सहायता के बिना किसी भी पत्र का चलना असंभव था।
अख़बार निकालने के खर्चे का अनुमान नहीं लगा सके शुक्ल जी
उस समय तक बिहार और उत्तर प्रदेश का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजों के पास चला गया था। दिल्ली के बादशाह शाह आलम के साथ 1764 में बक्सर में जो संधि हुई उसके चलते वह 40 हज़ार वर्ग मील का इलाक़ा खो बैठा। उधर अवध का साम्राज्य भी कमजोर पड़ रहा था। अतः इन सब इलाक़ों में अंग्रेजों ने अपनी बंदोबस्त प्रणाली लागू की और यहां के किसान कलकत्ता मजदूरी के लिए पहुंचने लगे। बड़ा बाजार ही उनका ठिकाना था। इसके अलावा भारत की इस राजधानी में राजस्थान के मारवाड़ी सेठ और पंजाब के खत्री व्यापारी पहुंचे। इन सबने शुक्ल जी से अख़बार निकालने का दबाव डाला। क्योंकि उनके बीच जुगुल किशोर शुक्ल काफ़ी पढ़े-लिखे और चलते-पुर्जे व्यक्ति माने जाते थे। मगर शुक्ल जी ने अख़बार तो निकाला उसके खर्च के मॉडल को नहीं समझा। उन्होंने पाठकों से चंदा और उद्दंत मार्तंड की किमत्ब से ही खर्च निकालने की सोची थी। बस यहीं उनसे चूक हो गई।
जुगुल किशोर के जीवन के बारे में सब मौन
शुक्ल जी का प्रयास डेढ़ साल में दम तोड़ गया। दु:खी होकर शुक्ल जी ने चार दिसंबर 1827 के अंतिम अंक के मुखपृष्ठ पर लिखा- “ आज दिवस लौं उग चुक्यो मार्तण्ड उदंत, अस्ताचल को जात है दिनकर दिन अब अंत!” यानी उदंत मार्तंड बस आज तक ही उग चुका। अब यह सूर्य अस्ताचल को जा रहा है। इसके बाद पंडित जुगुल किशोर शुक्ल ने क्या किया, इसकी कोई सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं है। विक्टोरिया मेमोरियल और राजा राम मोहन रॉय नेशनल लाइब्रेरी से उपलब्ध जानकारी के अनुसार वे उदंत मार्तंड बंद हो जाने के बाद बुरी तरह टूट गए और अपने वकालत के पेशे में लौट गए। कुछ स्रोत यह भी बताते हैं कि वे उत्तर भारतीयों के बीच कुछ सामाजिक कार्य करते रहे। उत्थान जैसी पत्रिकाओं का भी संपादन किया। मगर किसी के पास कोई अधिकृत जानकारी नहीं है। यहां तक कि उनकी मृत्यु कब हुई, यह भी अज्ञात है।
उदंत मार्तंड के बाद के अखबार
यद्यपि उदंत मार्तंड के प्रकाशन के पूर्व अंग्रेजी, बांग्ला, फारसी और उर्दू के अखबार धड़ल्ले से निकल रहे थे। ऐसे में शुक्ल जी और उनके साथियों ने हिंदी में एक अखबार निकालने का साहस किया। उस समय की पत्रकारिता भारतीय राष्ट्रवाद और जातीय चेतना के प्रति पूर्णरूप से सचेत थी। ‘उदंत मार्तंड’ साप्ताहिक पत्र आज की साप्ताहिक पत्रिकाओं से एकदम भिन्न था। उसमें लेख कम स्थानीय खबरें छपती थीं और सामाजिक गतिविधियां भी। इसका एक उद्देश्य हिंदी के प्रचार-प्रसार की जानकारी भी लोगों तक देना था। बहुत सारी खबरें इस तरह छापनी पड़तीं ताकि अखबार सीधे गोरी हुकूमत की नजरों में न चढ़ जाए। अलबत्ता पंडित जुगुल किशोर शुक्ल की पहल के बाद हिंदी में ‘बंगदूत’ का प्रकाशन 1829 में शुरू हुआ और 1834 में प्रजामित्र निकलना शुरू हुआ।
गर तोप मुकाबिल हो, अखबार निकालो
हिंदी पत्रकारिता को पूर्णतया राजनीतिक स्वरूप प्रदान करने वाले गणेश शंकर विद्यार्थी थे। जिन्होंने 1913 में कानपुर से ‘प्रताप’ साप्ताहिक निकाला और फिर उसे दैनिक कर दिया। गणेश जी स्वयं भी क्रांतिकारी चेतना वाले राजनीतिक थे। यद्यपि वे कांग्रेस पार्टी से जुड़े थे और उत्तर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे। किंतु इसके बावजूद उन्होंने चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह आदि सभी क्रांतिकारियों को अंग्रेजों की नजर से बचाकर रखा। आजादी की लड़ाई में अखबारों का इस्तेमाल हथियार की तरह किया गया। खुद गांधीजी ने भी गुजराती और अंग्रेजी में समाचार पत्र निकाले। बाद में उन्होंने हिंदी में भी यह काम शुरू किया। अकबर इलाहाबादी का एक शेर है- खींचो न कमानों को न तलवार निकालो, गर तोप मुकाबिल हो, अखबार निकालो!
शंभूनाथ शुक्ल, वरिष्ठ पत्रकार
