सामयिकी : डिग्री हाथ में, नौकरी कहां
भारत आज विश्व के सबसे युवा देशों में गिना जाता है। यहां की बड़ी युवा आबादी देश की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है, लेकिन जब यही युवा पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार की तलाश में भटकता है, तो यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं रह जाती, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय चिंता का विषय बन जाती है। आज भारत में बढ़ती बेरोजगारी पर अक्सर यह सवाल उठता है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है नौजवान या सरकार?
क्या युवा मेहनत नहीं करना चाहते या व्यवस्था में ऐसी कमियां हैं, जो उनकी मेहनत को मंजिल तक पहुंचने नहीं देतीं? सच यह है कि इस समस्या के पीछे कई जटिल कारण हैं, जिनमें व्यवस्था, शिक्षा प्रणाली, आर्थिक परिस्थितियां और बदलती सामाजिक अपेक्षाएं सब शामिल हैं।
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि आज का युवा पहले की तुलना में कहीं अधिक शिक्षित और जागरूक है।लाखों छात्र वर्षों तक कठिन परीक्षाओं की तैयारी करते हैं, कोचिंग लेते हैं, अपना समय, पैसा और ऊर्जा लगाते हैं, लेकिन जब सरकारी भर्तियां समय पर नहीं निकलतीं, वर्षों तक पद खाली पड़े रहते हैं या निकलने के बाद भर्ती प्रक्रिया अनिश्चितता में फंस जाती है, तब युवाओं के मन में निराशा पैदा होना स्वाभाविक है।
भारत में बेरोजगारी का एक बड़ा कारण भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और अनियमितता है। कई विभागों में वर्षों तक वैकेंसी नहीं आतीं और जब आती हैं, तो परीक्षा से लेकर नियुक्ति तक की प्रक्रिया बहुत लंबी हो जाती है। कई बार पेपर लीक जैसी घटनाएं पूरी मेहनत पर पानी फेर देती हैं। एक परीक्षा के लिए लाखों युवा महीनों-सालों तक तैयारी करते हैं, लेकिन पेपर लीक होने पर परीक्षा रद्द हो जाती है और उन्हें फिर से उसी संघर्ष में लौटना पड़ता है।
इससे केवल समय की हानि नहीं होती, बल्कि मानसिक तनाव और विश्वास की भी कमी पैदा होती है। इसके अलावा, कई भर्तियां कोर्ट केसों में उलझ जाती हैं। रिजल्ट आने के बाद आपत्तियां, आरक्षण विवाद, चयन प्रक्रिया पर सवाल या प्रशासनिक त्रुटियां भर्ती को वर्षों तक रोक देती हैं। इस दौरान लाखों युवा उम्र सीमा पार करने की चिंता में जीते हैं। इस प्रश्न का दूसरा पक्ष भी है। बदलते समय में रोजगार का स्वरूप बदल रहा है।
आज केवल सरकारी नौकरी ही रोजगार का एकमात्र विकल्प नहीं रह गया है। निजी क्षेत्र, स्टार्टअप, डिजिटल स्किल, स्वरोजगार और उद्यमिता भी अवसर प्रदान कर रहे हैं। कई बार देखा गया है कि कुछ युवा केवल सरकारी नौकरी पर निर्भर रह जाते हैं और अन्य संभावनाओं की ओर ध्यान नहीं देते। बदलते बाजार के अनुसार कौशल विकसित न करना भी बेरोजगारी का एक कारण बनता है।
हमारी शिक्षा प्रणाली भी इस समस्या में कहीं न कहीं योगदान देती है। स्कूल और कॉलेजों में अधिकतर सैद्धांतिक शिक्षा दी जाती है, जबकि नौकरी के लिए आवश्यक व्यावहारिक कौशल, संचार क्षमता, तकनीकी ज्ञान और उद्योग से जुड़ी ट्रेनिंग की कमी रहती है। परिणामस्वरूप डिग्री होने के बावजूद कई युवा रोजगार योग्य नहीं बन पाते। इस समस्या का समाधान केवल आलोचना में नहीं, बल्कि ठोस सुधारों में है। सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी सरकारी भर्तियां तय समय सीमा में पूरी हों।
दूसरा परीक्षा में धांधली और पेपर लीक पर सख्त कानून और त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए। साथ ही कॉलेज और विश्वविद्यालयों में स्किल डेवलपमेंट, डिजिटल ट्रेनिंग और व्यावसायिक शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि युवा केवल डिग्रीधारी नहीं बल्कि रोजगार योग्य बनें।
युवाओं को केवल नौकरी खोजने वाला नहीं, बल्कि नौकरी देने वाला बनने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। यदि युवा को ईमानदार अवसर, पारदर्शी व्यवस्था और सही दिशा मिले, तो वही युवा देश की प्रगति का सबसे बड़ा आधार बन सकता है। युवाओं को संघर्ष करना होगा, लेकिन व्यवस्था को भी उनके सपनों के साथ न्याय करना होगा। ( ये लेखिका के निजी विचार है)
