दोस्ती, दूरी और ड्रैगन : बदलते भारत-नेपाल संबंधों की कहानी
दक्षिण एशिया की राजनीति में भारत और नेपाल का रिश्ता सबसे अनोखा, जटिल और सबसे भावनात्मक रिश्तों में से एक माना जाता है। दुनिया में बहुत कम ऐसे पड़ोसी देश हैं, जिनके बीच सीमाएं भी खुली हों और समाज भी इतने गहरे स्तर पर जुड़े हों। भारत और नेपाल का संबंध केवल दो सरकारों का संबंध नहीं है; यह सदियों से साझा संस्कृति, धर्म, भाषा, व्यापार, परंपराओं और मानवीय रिश्तों का जीवंत उदाहरण रहा है, लेकिन यही रिश्ता समय-समय पर अविश्वास, राष्ट्रवाद, सीमा विवाद और भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की वजह से तनावपूर्ण भी हो जाता है।
हाल के दिनों में नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के एक बयान ने फिर यही सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर भारत-नेपाल संबंध बार-बार सीमा विवाद और राजनीतिक असहजता के मोड़ पर क्यों पहुंच जाते हैं। बालेन शाह ने नेपाली संसद में कहा कि सिर्फ भारत ने ही नेपाली भूमि पर अतिक्रमण नहीं किया, बल्कि नेपाल ने भी कुछ भारतीय इलाकों पर कब्जा कर रखा है। बयान के बाद नेपाल की संसद में हंगामा मच गया। विपक्ष ने उनसे सबूत मांगे, विदेश मंत्रालय को सफाई जारी करनी पड़ी और सोशल मीडिया पर तीखी बहस शुरू हो गई।
पहली नजर में यह एक सामान्य राजनीतिक बयान लग सकता है, लेकिन वास्तव में यह उस गहरे बदलाव का संकेत है, जो पिछले कुछ वर्षों में भारत-नेपाल संबंधों में दिखाई दे रहा है। यह केवल सीमा विवाद का मामला नहीं है। इसके पीछे राष्ट्रवाद, भू-राजनीति, चीन की बढ़ती भूमिका, नेपाल की नई राजनीतिक सोच और भारत की पारंपरिक पड़ोसी नीति से जुड़ी कई परतें मौजूद हैं।
भारत और नेपाल का रिश्ता आधुनिक सीमाओं से कहीं पुराना है। हिमालय से गंगा के मैदान तक फैली सांस्कृतिक धारा ने दोनों देशों को हजारों वर्षों से जोड़े रखा है। नेपाल के पशुपतिनाथ मंदिर और भारत की काशी के बीच धार्मिक संबंध हों या जनकपुर और अयोध्या का सांस्कृतिक जुड़ाव-दोनों देशों ने हमेशा एक-दूसरे को प्रभावित किया है। नेपाल के लाखों नागरिक भारत में शिक्षा प्राप्त करते हैं, रोजगार करते हैं और व्यापार से जुड़े हैं। भारतीय शहरों में नेपाली समुदाय सहज रूप से घुला-मिला दिखाई देता है।
भारत की सेना में गोरखा रेजिमेंट का गौरवपूर्ण इतिहास दोनों देशों के भरोसे और साझेदारी का प्रतीक रहा है। खुली सीमा ने इस रिश्ते को और विशेष बनाया है। दुनिया के अधिकांश देशों के विपरीत भारत और नेपाल के नागरिक बिना वीजा और पासपोर्ट के एक-दूसरे के यहां आ-जा सकते हैं। यही वजह है कि भारत-नेपाल संबंध केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और भावनात्मक संबंध भी है। राजनीतिक तनाव पैदा हो सकते हैं, लेकिन जनता के स्तर पर अपनापन अक्सर बना रहता है।
भारत-नेपाल संबंधों की आधुनिक संरचना काफी हद तक 1950 की भारत-नेपाल शांति और मैत्री संधि पर आधारित है। इस संधि का उद्देश्य दोनों देशों के बीच सुरक्षा सहयोग, व्यापार और नागरिक आवाजाही को आसान बनाना था। उस समय चीन में कम्युनिस्ट क्रांति और हिमालयी क्षेत्र की बदलती भू-राजनीति को देखते हुए भारत नेपाल को अपनी सुरक्षा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता था। इस संधि ने नेपाल को भारत के साथ विशेष आर्थिक और सुरक्षा संबंध दिए।
व्यापार, निवेश और रोजगार के अवसर बढ़े, लेकिन समय के साथ नेपाल में यह धारणा मजबूत होने लगी कि यह संधि बराबरी के आधार पर नहीं बनी थी। नेपाल के कई राजनीतिक दल और बुद्धिजीवी इसे ‘असमान संधि’ बताते रहे हैं। भारत इस संधि को सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग के लिए महत्वपूर्ण मानता है, जबकि नेपाल इसे अपनी संप्रभुता और स्वतंत्र विदेश नीति से जोड़कर देखता है। यही कारण है कि संधि की पुनर्समीक्षा की मांग समय-समय पर उठती रहती है। (ये लेखक के निजी विचार हैं)
