होनहार बालक: चंद्रगुप्त मौर्य के साहस, दानशीलता और कुशाग्र बुद्धि की अमर गाथा

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Published By Muskan Dixit
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गौरीशंकर वैश्य विनम्र, लखनऊः बालक के पिता राजा घनानंद के यहां सेनापति थे। घनानंद ने उन्हें किसी साधारण कारण से एक दिन बंदी बना लिया। मां बहुत कष्ट में पड़ गईं। आशा की एक मात्र ज्योति उनका बालक था, उसका नाम था चंद्रगुप्त। एक दिन चाणक्य ने बालक का खेल देखा। वह शिशुओं का राजा बना था। वह किसी-किसी की पीठ पर बैठकर सवारी करता और कहता-“मैं घोड़े पर बैठा हूं, मैं राजा हूं। मैं किसी से नहीं डरता।” चंद्रगुप्त ने चाणक्य को बहुत प्रभावित किया। उन्होंने चंद्रगुप्त को प्रणाम करके कहा- “राजन! दूध के लिए एक गाय चाहिए।” चंद्रगुप्त ने बिना दीनता दिखाए तत्परता से कहा-“सामने गाए हैं, जितनी चाहो, ले लो।” तभी चंद्रगुप्त की मां आ गई। मां ने विनम्रता से कहा-“विप्रवर! आप बालक के कहने में न आएं। ये गाएं किसानों की हैं। चंद्रगुप्त इन्हें कैसे दे सकता है।” बालक चंद्रगुप्त ने कहा- “मैं राजा हूं। मेरे रहते कोई कैसे इन गायों पर अधिकार बता सकता है?” चाणक्य बालक की दानशीलता और साहस से बहुत प्रभावित हुए और मां को बताया कि “यह बालक बड़ा होनहार है। यह किसी न किसी दिन अवश्य राजा बनेगा। चंद्रगुप्त को आप राजसभा में लेकर आइए।” चंद्रगुप्त की मां ने कहा- “राजा घनानंद ने इस बालक के पिता को बंदी बना लिया है। इसलिए हम यहां सुरक्षित हैं, वहां नहीं। राजा जब चाहेगा, इसका वध करा देगा।” चाणक्य ने कहा-“जीवन की चिंता तुम्हें नहीं करनी चाहिए, जो जन्म देता है,वही मारता है।” साहसी और चपल बालक चंद्रगुप्त ने घनानंद के पास जाने का हठ किया, तो मां चंद्रगुप्त को लेकर राजसभा पहुंची। राजसभा में विवाद चल रहा था। एक बड़े कटघरे में शेर बंद था। घनानंद ने कहा-“बिना पिंजड़ा खोले शेर को कैसे निकाला जा सकता है?” बुद्धिमान बालक चंद्रगुप्त ने पिंजड़े और उसके शेर को देखा और ऊंचे स्वर में कहा-“मैं इसे बिना पिंजड़ा खोले निकालूंगा।” सभासदों ने अट्टहास किया। कौतुक में राजा ने बालक का परिचय पूछा। यह जानकर कि यह मौर्य सेनापति का पुत्र है, राजा बहुत क्रोधित हो उठा और गरजा -“अगर शेर न निकाल सके। तो तुम्हें इस पिंजड़े में बंद कर दिया जाएगा।” चंद्रगुप्त भी जानता था कि सामने राजा के रूप में यमदूत है। अतः उसने सूक्ष्म निरीक्षण किया। उसने गर्म सलाखों से शेर को तपाना शुरू किया। मोम का शेर पिघल गया और पिंजड़ा खाली हो गया। चंद्रगुप्त की बुद्धि की सभी ने प्रशंसा की। घनानंद ने भी अपने हित में बालक को संरक्षण दिया। ऐसा था वीर साहसी बालक चंद्रगुप्त, जो बाद में भारत का चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य बना। 

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