मौसम के मिजाज को बिगाड़ेगा सुपर-अल नीनो

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Published By Deepak Mishra
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अर्क सुपर कंप्यूटर द्वारा बनाए गए मॉडल के अनुसार अबकी बार सुपर-अल नीनो भी विकसित हो सकता है। तब हालात और बिगड़ेंगे, अर्थात अधिक गर्मी, अधिक सूखा या अतिवृष्टि।

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रणबीर सिंह, विज्ञान लेखक

 

एक अत्यंत शक्तिशाली अल नीनो का प्रभाव हमारे देश को छूने ही वाला है। अगले चार-पांच महीनों के मौसम के बारे में हम क्या उम्मीद कर सकते हैं, जिससे निश्चित रूप से भारत में मानसून वर्षा की मात्रा और देश के करोड़ों लोगों का जीवन यापन जुड़ा हुआ है। अल नीनो एक आवर्ती जलवायु घटना है, जिसका प्रभाव दुनिया भर पर पड़ता है। इसके तीन चरण हैं: एक को ठंडा ला नीना के रूप में जाना जाता है, दूसरा तटस्थ स्वभाव का और तीसरा गर्म होता है। सन् 2026 में, उत्तरी गोलार्ध में बसंत ऋतु का प्रभाव कोई ख़ास या विशेष रूप से प्रफुल्लित करने वाला न था, जिसके अंत के बाद ज्येष्ठ का महीना आया। 

भारत में उत्तरी अक्षांशों में बसंत का अंत बैशाख तक रहता है। चूंकि अबकी बार का ज्येष्ठ महीना दोहरा है, इसलिए ऋतु-प्रभाव थोड़ा पसर गया। इसके चलते मौसम के अल्पकालिक पूर्वानुमान मॉडल संकेत देते हैं कि दूसरा ज्येष्ठ महीना पूरा होने से पहले ही संभावना है कि हम अल नीनो चरण में प्रवेश कर जाएंगे। वर्ष के अंत तक अल नीनो बहुत तीव्र हो सकता है, क्योंकि अर्क सुपर कंप्यूटर द्वारा बनाए गए मॉडल के अनुसार अब की बार सुपर-अल नीनो भी विकसित हो सकता है। तब हालात और बिगड़ेंगे, अर्थात अधिक गर्मी, अधिक सूखा या अतिवृष्टि। इनमें से तीनों का जनजीवन पर व्यापक असर होता है, लेकिन यह असर कैसा हो सकता है? क्या पहले भी कुछ ऐसा ही हुआ है?

प्रशांत महासागर क्षेत्र में कभी-कभार होने वाली एक असामान्य गर्म समुद्री धारा को मूल रूप से 19वीं सदी के पेरू के मछुआरों ने देखा था। उन्होंने इसे स्पेनिश में अल नीनो कहा। यह तब हुआ जब दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप के देश इक्वाडोर के गुआयाकिल शहर के दक्षिण, पेरू और उत्तरी चिली के तटों पर भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र के गर्म पानी ने सामान्य ठंडे पानी की जगह ले ली थी। यह पानी आमतौर पर हम्बोल्ट धारा के कारण काफी ठंडा होता है, जो दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के समुद्र तट के इस हिस्से के साथ दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है और गहरे ठंडे पानी के ऊपर उठने के कारण प्रभाव दिखाती है। इन धाराओं का प्रभाव महत्वपूर्ण है, जिसकी वजह से तटीय देशों में तापमान कहीं 18 तो दूसरी जगह 24 डिग्री सेल्सियस हो जाता है।

एक महासागरीय और वायुमंडलीय आश्चर्यजनक घटना सन् 1920 के दशक में, ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी और जलवायु विज्ञानी गिल्बर्ट वॉकर ने खोजी थी। बड़ी मात्रा में वायुमंडलीय दबाव डेटा का विश्लेषण करते समय, उन्होंने महसूस किया कि जब दक्षिण अमेरिकी प्रशांत क्षेत्र में वायुमंडलीय दबाव बढ़ता है, तो यह उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया में कम हो जाता है। एक दूसरे से हजारों किलोमीटर दूर ये दो क्षेत्र वायुमंडलीय दबाव व्यवहार के संदर्भ में जुड़े हुए थे। 

पूरे दक्षिण प्रशांत महासागर में वायुमंडलीय दबाव में इस समन्वित दोलन या ऑसिलेशन को दक्षिणी दोलन या सदर्न ऑसिलेशन नाम दिया गया। सवाल है कि अल नीनो और एक समुद्री धारा का दक्षिणी दोलन एवं एक वायुमंडलीय घटना से क्या लेना-देना है? सन् 1957-1958 में, बहुत तीव्र अल नीनो के कारण पेरू और अन्य देशों में मूसलाधार बारिश हुई और भारत और दक्षिण पूर्व एशिया में भयंकर सूखा पड़ा, जिससे इस घटना पर आगे के शोध को बढ़ावा मिला। 

सन् 1960 के दशक में, नॉर्वेजियन-अमेरिकी मौसम विज्ञानी जैकब बर्कनेस ने पाया था कि अल नीनो के कारण दक्षिण अमेरिकी प्रशांत महासागर का गर्म होना दक्षिणी दोलन से जुड़ा था, जिससे समुद्र और वायुमंडल के बीच घनिष्ठ संबंध स्थापित हुआ था। अमेरिकन मेट्योरोलॉजिकल सोसाइटी द्वारा प्रकाशित मंथली वेदर रिव्यु के मार्च 1969 के अंक में जैकब बर्कनेस का यह अध्ययन दस पन्नों में प्रकाशित हुआ था, जिसके निष्कर्ष में कहा गया कि पैसिफिक इक्वेटोरियल बेल्ट से अतिरिक्त गर्मी और लेटेंट हीट, या गुप्त ऊष्मा, मिलने से सर्दियों में वॉकर सर्कुलेशन के मज़बूत होने के बार-बार देखे गए मामलों से अब यह बात सही साबित होती है कि लंबे समय के मौसम के अनुमान में ऐसे अनुभवों का सावधानी से इस्तेमाल किया जाए। 

इस तरह की कोशिशों को इस बात से और समर्थन मिलता है कि पैसिफिक इक्वेटर पर तापमान में बदलाव सर गिल्बर्ट वॉकर के प्रस्तावित सदर्न ऑसिलेशन से जुड़े हैं। सन् 1963 के सदर्न ऑसिलेशन अध्ययन मामले की विस्तार से जांच करने पर पता चलता है कि पैसिफिक इक्वेटर के साथ गर्मी से बने वॉकर सर्कुलेशन ने कई सालों तक सिर्फ़ छोटे-मोटे बदलावों के बाद इसमें एक नई बड़ी हलचल या पल्स शुरू की थी।

इसके बारे में रिसर्च से यह देखने की ज़रूरत है कि क्या सदर्न ऑसिलेशन में हलचल असल में पैसिफिक में इक्वेटोरियल महासागर और वातावरण के बीच होने वाली प्रतिक्रिया से नियमित रूप से शुरू होती है, या कुछ और भी घटक इसमें शामिल हैं। सन् 1969 के बाद से मौसम अध्ययन की टेक्नोलॉजी में जबरदस्त विकास होने और अत्यधिक उन्नत कंप्यूटरों के उपलब्ध होने से मौसम अध्ययन में निखार आया है।

अल नीनों और इसके भाई ला-नीना के बारे में भारत मौसम विभाग भी दशकों से निगरानी रख रहा है और हिंद महासागर क्षेत्र में तापमान परिवर्तन और वायुमंडलीय दबाव पर निगरानी रखता है, ताकि मुख्य भारत भूमि पर इसके प्रभाव का पूर्व आकलन करके समय रहते जरूरी कदम उठाए जा सकें। सन् 1986-87 के अल नीनों प्रभाव ने भारत में मानसूनी वर्षा को कम कर दिया है, लेकिन टेक्नोलॉजी और अन्य उपायों से इसके प्रभाव से जनजीवन को अस्तव्यस्त न होने दिया था। इस सूखे पर भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के अलावा डिपार्टमेंट ऑफ़ साइंस एंड टेक्नोलॉजी के अधीन काम करने वाले भारत मौसम विभाग ने रिपोर्ट्स का प्रकाशन किया था। कृषि मंत्रालय ने दो खंडों में इस रिपोर्ट को प्रकाशित किया था। (यह लेखक के निजी विचार हैं)