उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में मुद्दों की अग्नि परीक्षा
उत्तराखंड में चुनावी शंखनाद हो चुका है। 2027 में सत्ता का किला फतह करने के लिए भाजपा और कांग्रेस के बीच इस बार मुकाबला काफी सख्त माना जा रहा है।
अमित शर्मा, हल्द्वानी
उत्तराखंड में चुनावी शंखनाद हो चुका है। सियासी धड़कनें बढ़ने लगी हैं, तो चुनावी मुद्दे हवा में तैरने लगे हैं। 2027 में सत्ता का किला फतह करने के लिए भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच इस बार मुकाबला काफी कड़ा माना जा रहा है। भाजपा में जहां मुद्दों को लेकर स्थिति स्पष्ट है, तो विपक्ष में मंथन जारी है, लेकिन जिस तरह की परिस्थितियां वर्तमान में दिखाई दे रही हैं उससे इसकी प्रबल संभावना यही है कि इस बार दोनों दलों के बीच मुद्दों की अग्नि परीक्षा में क्षेत्रीय विकास के साथ ही राष्ट्रवाद और हिंदुत्व कार्ड कहीं न कहीं हावी रहेगा, हालांकि किसी भी सियासी समर में चुनाव से कुछ दिन पहले ही सामने आने वाले असली मुद्दों से ही चुनाव का असली रुख तय होता है। अब देखना है कि भाजपा और कांग्रेस के इन मुद्दों के कितने तीर निशाने पर बैठते हैं।
हाल ही में भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन उत्तराखंड के तीन दिवसीय दौरे पर रहे। इस दौरान विभिन्न बैठकों और आयोजनों में उन्होंने उत्तराखंड भाजपा को पूरी तरह से मथ दिया। कागजी रिपोर्टों से अलग हटकर सरकार और संगठन के बड़े चेहरों से लेकर आम कार्यकर्ताओं से पार्टी मुखिया नबीन सीधे तौर पर रूबरू हुए। उन्होंने बैठकों से निकलकर बूथों पर पहुंचकर जमीनी हकीकत को जाना। यह पार्टी की चुनावी विशेषता ही है कि एक चुनाव का फाइनल नतीजा आने के बाद संगठन अगले चुनाव की तैयारियों में उसी दिन से जुट जाता है। यानी चुनावी तैयारियां महज कुछ दिनों या महीनों की नहीं, बल्कि पूरे पांच साल की होती हैं। पन्ना प्रमुख से लेकर बूथ प्रमुख तक रोजाना चुनावी गतिविधियों के लिहाज से अपडेट रहते हैं।
उत्तराखंड की भाजपा सरकार के साढ़े चार साल के कार्यकाल में सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यटन सेक्टर में काफी विकास हुआ है, तो देश दुनिया की आस्था के प्रमुख केंद्रों में शुमार श्री केदारनाथ और श्री बद्रीनाथ धाम जैसे धार्मिक मुद्दों पर भी पकड़ और मजबूत हुई है। केदारखंड के बाद मानसखंड को धार्मिक यात्रा के साथ पर्यटन से जोड़ने की दिशा में आदि कैलाश और ओम पर्वत में बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या एक नए पर्यटन हब के तौर पर देखी जा रही है। भाजपा ने समाज के हर प्रमुख वर्ग पर मुद्दों की बिसात पर अपनी पकड़ बरकरार रखी है। चाहे वह उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लागू करना रहा हो या फिर जनसंख्या नियंत्रण कानून को लागू करने की तैयारी हो। नकल विरोधी कानून हो या फिर सख्त भू कानून।
यूसीसी की गंगा तो उत्तराखंड से निकलकर गुजरात से होते हुए असम तक यात्रा कर रही है। जल्द ही इसके मध्य प्रदेश में भी पहुंचने की उम्मीद है। सरकारी जमीनों पर अतिक्रमण, अवैध मदरसों और अल्पसंख्यक मामलों पर भाजपा का रुख शुरुआत से काफी आक्रामक रहा है। सैनिक बहुल्य राज्य में सैनिकों, पूर्व सैनिकों और उनके परिजनों का सम्मान भी देवभूमि के साथ भाजपा की पंरपरा रही है। ऑपरेशन कालनेमि और ऑपरेशन प्रहार चर्चाओं में रहे हैं।
भाजपा के लिए चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण उसके संगठन का मजबूत ढांचा और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के चेहरे के साथ मजबूत इच्छाशक्ति है। जो सियासी संकेत हाल में मिल रहे हैं, उससे मौजूदा स्थिति इस समय सर्वमान्य वाली मानी जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का उत्तराखंड आकर देवभूमि और राज्य सरकार की खुले दिल से प्रशंसा करना और सरकार के मुखिया के तौर पर केंद्र में जाकर अहम विकास योजनाओं को मंजूर कराना भी प्रदेश के विकास और चुनावी दृष्टिकोण से काफी अहमियत रखता है। वहीं, इस सरकार के अभी तक के कार्यकाल में विपक्षी दलों ने जो भी बड़े मुद्दे सामने रखे, उनका भाजपा ने काउंटर अटैक करने में देर नहीं की और सरकार के साथ ही संगठन स्तर पर इसकी कवायद अभी भी जारी है। वर्तमान की बात करें तो विधानसभा चुनाव के लिए पूरी तरह से तैयार भाजपा के लिए उत्तराखंड में सबसे बड़ा लक्ष्य अब जीत की हैट्रिक लगाना है।
बात यहां अब प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की करें, तो उसके राजनीतिक तरकश में वर्तमान में कई मुद्दे हैं। इनमें प्रदेश की कानून और सुरक्षा व्यवस्था के साथ ही युवाओं की बेरोजगारी है। इसके अलावा, कथित तौर पर भर्ती परीक्षा घोटाला, मूल निवास, सशक्त भू-कानून, गैरसैंण को स्थायी राजधानी बनाना, पलायन, हेल्थ सेक्टर में अव्यवस्थाएं जैसे कांग्रेस के आरोप भी सुर्खियों में रहते हैं। आरोप यह भी है कि भाजपा सरकार दिखावा ज्यादा करती है और उसकी कई योजनाएं समय पर पूरी नहीं हुई हैं। राहुल गांधी का दो दिवसीय उत्तराखंड दौरा प्रस्तावित है। वे अल्मोड़ा, पौड़ी और देहरादून में प्रवास पर रहेंगे। पौड़ी में वे पूर्व सैनिकों के साथ संवाद करेंगे। उनके आगमन से निश्चित ही कांग्रेस में नयी ऊर्जा का संचार होगा।
बहरहाल, चुनावी समर जीतने के लिए, जहां विकास के साथ ठोस मुद्दे ही चल पाते हैं, तो उससे भी अहम बात किसी भी पार्टी में सर्वमान्य चुनावी चेहरा होता है, जिससे भितरघात की संभावना काफी हो जाती है। संगठन के तौर पर चुनावी तैयारियों को जमीन पर उतरकर परखा जाता है। भाजपा जहां बंगाल और असम के चुनावी नतीजों से उत्साहित है, तो कांग्रेस को उत्तराखंड की सत्ता में वापसी करने के लिए भगीरथ प्रयास करने होंगे। 2027 के विधानसभा चुनाव को जहां भाजपा हैट्रिक के तौर पर देख रही है, तो कांग्रेस के लिए यह वापसी की जंग मानी जा रही है।
भाजपा में मुख्यमंत्री का चेहरा पुष्कर सिंह धामी के रूप में तय है, तो वह विकास, राष्ट्रवाद व हिंदुत्व के दम पर चुनाव में उतरेगी। कांग्रेस को तमाम मुद्दों को उठाने के साथ ही चुनावी मैदान में उतरने से पहले चुनावी चेहरे को फाइनल करना होगा, क्योंकि कांग्रेस में इस समय अभी यही तय नहीं है कि वह किसके चेहरे पर चुनाव लड़ेगी। कांग्रेस में इस समय सबसे बड़ी चुनौती चेहरे के साथ ही अस्तित्व की होगी। सत्ता में वापसी के लिए कांग्रेस को आपसी मतभेद भुलाकर हर स्तर पर एकजुट होना होगा और एक चेहरे के साथ चुनाव में उतरना होगा। अगर पार्टी इसकी विपरीत धारा में चली तो चुनावी नतीजा क्या होगा, सब जानते हैं।
