बरेली: शिक्षक भी अनजान… तो खेल-खेल में कैसे सीख सकेंगे बच्चे
रजनेश सक्सेना, बरेली। चलिए… अभिभावक होड़ के कारण मासूमों को स्कूल भेज देते हैं, उन पर पढ़ने-लिखने के साथ होमवर्क का दबाव बनाते हैं। लेकिन शिक्षकों की क्या मजबूरी है कि उनमें 95 प्रतिशत चाहते हैं कि बच्चों को महज दो-ढाई वर्ष की उम्र में ही स्कूल भेज देना चाहिए। 97 प्रतिशत का मानना है …
रजनेश सक्सेना, बरेली। चलिए… अभिभावक होड़ के कारण मासूमों को स्कूल भेज देते हैं, उन पर पढ़ने-लिखने के साथ होमवर्क का दबाव बनाते हैं। लेकिन शिक्षकों की क्या मजबूरी है कि उनमें 95 प्रतिशत चाहते हैं कि बच्चों को महज दो-ढाई वर्ष की उम्र में ही स्कूल भेज देना चाहिए। 97 प्रतिशत का मानना है एक वर्ष में ही बच्चों को लिखना-पढ़ना और जोड़ घटाना आ जाना चाहिए। प्रदेश शिक्षा विभाग द्वारा कराए शोध में यह बात भी उजागर हुई है। इसका मतलब शिक्षाविदों, मनोवैज्ञानिकों, सरकार के आदेश-निर्देशों की उन्हें जानकारी नहीं है।
नई शिक्षा नीति में भी कहा गया है कि बच्चों को तीन साल की उम्र में स्कूल भेजा जा सकता है मगर उन पर लिखने-पढ़ने का दबाव नहीं डाला जा सकता, सिर्फ खेल-खेल में ही सिखाना है। निजी स्कूल के शिक्षक तो अपने स्कूलों की कमाई बनाए रखने के लिए भी ऐसा सोचने पर मजबूर हो सकते हैं।
प्रदेश के 28 जिलों में हुए इस लघु शोध के अनुसार साफ है कि 99 फीसदी शिक्षकों का मानना है कि दो से ढाई वर्ष में प्रवेश के बाद बच्चे को एक वर्ष में ही लिखना-पढ़ना और एक अंक वाला जोड़-घटाना आ जाना चाहिए जबकि केवल एक फीसदी शिक्षक ही यह मानते हैं कि प्रवेश के एक वर्ष के अंदर बच्चों के खेलने एवं मौखिक गतिविधियों पर ही जोर दिया जाना चाहिए। उन्हें किताबों के बोझ से दूर रखना चाहिए। इस शोध में सरकारी शिक्षकों के साथ ही करीब 700 निजी स्कूलों के शिक्षक भी शामिल हैं।
सरकारी स्कूलों के शिक्षक अपनी पूरी पढ़ाई-लिखाई भूलकर सिर्फ समाज के बनाए दायरे में ही फंसकर रह गए हैं जबकि ये शिक्षक पहले से अपनी पढ़ाई के दौरान बाल मनोविज्ञान, शिक्षण विधियां, शिक्षण तकनीक के माध्यम से सीख चुके होते हैं। वहीं, आए दिन शासन से आदेश, वेबिनार और तमाम माध्यमों से उन्हें सिखाने की कोशिश की जाती है। इसके बाद भी शिक्षक खुद संभलने को तैयार नहीं है। यदि बात करें निजी स्कूलों के शिक्षकों की तो वे खुद एक ऐसे संस्थान में कार्यरत हैं जहां उन्हें निशाना बना दिया जाता है। वे पूरी तरह से बंध चुके हैं। मजबूरी में भी बच्चों का कम उम्र में दाखिला कराने के लिए प्रेरित करते हैं।
बच्चे जब कमाई का माध्यम हैं तो किसे होगी परवाह
जिले के 28 जिलों में हुए इस लघुशोध की मानें तो अधिकतर शिक्षक बच्चों से धनार्जान करने में जुटे हुए हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि निजी स्कूल बच्चों का कम उम्र में दाखिला लेने के लिए इसलिए प्रेरित करते हैं ताकि उनके स्कूल की आमदनी हो सके। दाखिला होने के बाद तमाम स्कूलों में बच्चों की किताबें लगा दी जाती हैं जबकि बच्चों को केवल खेल-खेल में ही पढ़ाई करानी होती है। ऐसे में स्कूलों को उन किताबों से भी कमीशन मिलता है। साथ ही अभिभावकों से फीस भी मिलती है।
