झूठ की बैसाखी
मेरी पत्नी का मुझ पर बहुत यक़ीन है मेरे बच्चों को मुझ पर बहुत विश्वास है एक गर्व पूर्ण विश्वास जिससे कभी इश्क किया था पर न मिल पायी मुझे। वह आज भी कहती है तुझे खोने का बहुत दुख है मुझे बाँहें किसी की भी हो, सहारा किसी का भी हो पर ख़्वाब में …
मेरी पत्नी का मुझ पर बहुत यक़ीन है
मेरे बच्चों को मुझ पर बहुत विश्वास है
एक गर्व पूर्ण विश्वास
जिससे कभी इश्क किया था पर न मिल पायी मुझे।
वह आज भी कहती है तुझे खोने का बहुत दुख है मुझे
बाँहें किसी की भी हो, सहारा किसी का भी हो
पर ख़्वाब में तू ही रहता है
आँखों की शबनम को देख गौर से।
इसमें कौन रह रहा
मेरे साथ जुड़े वह तमाम लोग जो मेरे नक़्शे कदम पर चलना चाहते हैं
उनको बहुत भरोसा है उस जमीं पर जहाँ मेरे कदमों के निशाँ पड़े थे
पर मैं सब राज सबसे साझा नहीं करता।
अपना दर्द अपने ही भीतर ज़ब्त करता हूँ
अपने पापों का किसी को इल्म होने नहीं देता
मैंने जो मुक़ाम पुरुषार्थ नहीं फरेब से पाये हैं
वह सिर्फ़ मैं ही जानता हूँ।
मैं एक सामान्य आदमी हूँ जिसमें कमियाँ
अच्छाइयों से ज़्यादा हैं
पर मैं छिपाने के हुनर में माहिर हूँ
यही हुनर तो है जो मुझे अलग पहचान देता है।
मैं छिपाता क्यों हूँ
मैं सच क्यों नहीं कहता
क्या यह मुझे विरासत से मिली है उनसे
जो सफल थे अपने झूठ के सहारे
क्या मैं ग़ैर महफ़ूज़ हूँ।
क्या मैं लोगों के रददे- अमल से डरता हूँ
मैं यह सवाल हर दिन अपने आप से पूछता हूँ
और फिर कोई कह देता है
प्रशंसा में कुछ शब्द
मैं हक़ीकत की ज़मीं से झूठ के पाँव पर चलने लगता हूँ
इन झूठ की बैसाखियों पर चलते – चलते उकता गया हूँ।
मुझे सच का सुकून चाहिये
मैं एक फ़रेबी हूँ
मैंने तमाम षड्यन्त्र किये हैं
यह है मेरे पापों का जखीरा ….
मैंने कहने ही जा रहा था
मेरी बेटी की आवाज़ मेरे कानों में गूँजी
मैं डर गया
झूठ की बैसाखियों पर दौड़ने लग गया ..
-वीरेंद्र ओझा
