बचपन से सुना था वक़्त चलता है अपनी गति से

Amrit Vichar Network
Edited By Amrit Vichar
On

बचपन से सुना था वक़्त चलता है अपनी गति से पर जब जाना और देखा तो समझ आया ये तो जिन्दगी के साथ ज़िन्दगी की दौड़ लगाता है। बचपन में रेत और मिट्टी के घरोंदे भी सहेजे जाते थे अब दिलो को काट कर बने आशियाने को टूटते देखा है। अम्मा कहती थी घर में …

बचपन से सुना था वक़्त चलता है अपनी गति से
पर जब जाना और देखा तो समझ आया ये तो जिन्दगी के साथ ज़िन्दगी की दौड़ लगाता है।

बचपन में रेत और मिट्टी के घरोंदे भी सहेजे जाते थे
अब दिलो को काट कर बने आशियाने को टूटते देखा है।

अम्मा कहती थी घर में सपने बसते हैँ क्युकी यहाँ साथ मिलकर अपने हँसते हैँ
पर अब बड़े बड़े मकड़ी के जाले हैँ।

सालो से बंद पड़े जंक लगे किवाड़े हैँ.
कुछ समय की कमी थी कुछ रिश्तो की उदासीनता थी।

अब मेरा गांव जाना बंद सा हो गया था
ना चाहते हुए भी वो रिश्ता टूट गया था।

पर अब सोशल मीडिया का जमाना है
शायद इसी ने कुछ कमाल कर जाना है।

जिस पगडण्डी को हम बिना रुके चढ़ते थे वो अब ट्रैक बन गए हैँ
जहा होते थे गांव के चाचा ताऊ के खेत वो रिसोर्ट बन गए हैं।

अब गांव में बड़ी इमारते देख शहर सा महसूस होता हैं
शुद्ध हवा होते हुए भी अब मेरा दम घुटता है।

आँखे बंद कर अब अम्मा के सपने का घर नहीं दिखता है
नज़र दौड़ाने पर कोई चेहरा अपना नहीं लगता हैं।

मै एक बार फिर पहाड़ लौटा हूँ
अपनी ही खोज में।

क्यों झूठ मै बोलू की इसके लिए कुछ करने आया हूँ
बहुत कुछ लिया है पहाड़ से अब कुछ देने आया हूँ

मैं किसी ट्रैक पर नहीं वापस अपनी पगदंडियो पर दौड़ना चाहता हूँ
आसमान में कभी कबार आते हेलीकाप्टर को देख उड़ना चाहता हूँ

बहुत जी लिया एसी में अब पहाड़ की घाम सेकना चाहता हूँ
गिर कर फिर संभालना चाहता हूँ
इन वादियों में फिर खोना चाहता हूँ

मैं सिर्फ पहाड़ का हूँ
और
बस पहाड़ का होना चाहता हूँ।

-अपूर्वा कर्नाटक, निवासी- मुक्तेश्वर