मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए… इंसान को इंसान बनाया जाए
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए जिस में इंसान को इंसान बनाया जाए ।। जिस की ख़ुश्बू से महक जाए पड़ोसी का भी घर फूल इस क़िस्म का हर सम्त खिलाया जाए ।। आग बहती है यहां गंगा में झेलम में भी कोई बतलाए कहां जा के नहाया जाए ।। प्यार का ख़ून …
अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए
जिस में इंसान को इंसान बनाया जाए ।।
जिस की ख़ुश्बू से महक जाए पड़ोसी का भी घर
फूल इस क़िस्म का हर सम्त खिलाया जाए ।।
आग बहती है यहां गंगा में झेलम में भी
कोई बतलाए कहां जा के नहाया जाए ।।
प्यार का ख़ून हुआ क्यूं ये समझने के लिए
हर अंधेरे को उजाले में बुलाया जाए ।।
मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूं भूखा तो तुझ से भी न खाया जाए ।।
जिस्म दो हो के भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आंसू तेरी पलकों से उठाया जाए ।।
- गोपाल दास नीरज
