महंगाई की मार
कोरोना संकट के साथ ही महंगाई की वजह से लोगों की दिक्कतें कम होती नजर नहीं आ रही हैं। पेट्रोल, डीजल की महंगाई के साथ खाद्यान्नों की महंगाई ने आम आदमी का बजट बिगाड़ दिया है। सोमवार से शुरु हो रहे संसद के मानसून सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच मुख्य रूप से कोरोना …
कोरोना संकट के साथ ही महंगाई की वजह से लोगों की दिक्कतें कम होती नजर नहीं आ रही हैं। पेट्रोल, डीजल की महंगाई के साथ खाद्यान्नों की महंगाई ने आम आदमी का बजट बिगाड़ दिया है। सोमवार से शुरु हो रहे संसद के मानसून सत्र में सरकार और विपक्ष के बीच मुख्य रूप से कोरोना की दूसरी लहर और पेट्रोलियम पदार्थों की महंगाई एक बड़ा मुद्दा बन सकता है।
विपक्ष ने सत्र के दौरान कोरोना की दूसरी लहर के कारण हुए जानमाल के नुकसान और पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतों पर सरकार को घेरने की रणनीति बनाई है। संसद का मानसून सत्र 13 अगस्त तक चलेगा।
कोरोना महामारी के चलते लोगों की आय घटी है और वह महंगाई से परेशान है। इसके बावजूद केंद्र व राज्य सरकारों की तरफ से महंगाई पर रोक लगाने की दिशा में कोई गंभीर पहल होती नजर नहीं आ रही है। जानकारों के अनुसार देश में आवश्यक वस्तु अधिनियम के निष्क्रिय होने के बाद जमाखोरी बढ़ने की प्रवृति ने महंगाई बढ़ाने में भूमिका निभाई है। एक सर्वे के अनुसार देश में 79 प्रतिशत परिवारों की आमदनी में पिछले वर्ष की तुलना में कम हुई है, लेकिन खर्च में बढ़ोत्तरी हुई है।
वहीं लोगों की बचत भी 49 प्रतिशत घट गई है। पेट्रोल-डीजल की कीमत में बढ़ोतरी से हर आवश्यक वस्तुओं की कीमतें भी बढ़ गई हैं। इससे लोगों में रोष है। सरकार पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर खाद्यान्नों पर भी पड़ा है। खाद्य मुद्रास्फीति 5.58 प्रतिशत पहुंच गई है। दलहन मुद्रास्फीति बढ़कर 10.01 प्रतिशत हो गई है। फलों की महंगाई दर 11.82 प्रतिशत तक पहुंच गई है। परिवहन सेवा की महंगाई दर 11.56 प्रतिशत हो गई है। ईंधन महंगाई दर 12.68 प्रतिशत हो गई है।
ऐसे में पेट्रोल-डीजल पर एक्साइज ड्यूटी को कम किया जाना चाहिए। पिछले एक वर्ष में पेट्रोल की कीमत में 25 फीसदी और डीजल की कीमतों में 11 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जिससे देश की आर्थिक व्यवस्था चरमरा गई है। निस्संदेह वैश्विक स्तर पर पेट्रोल डीजल के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई, जिसके चलते देश में पेट्रोल सौ रुपये से अधिक बिक रहा है। मगर केंद्र व राज्य सरकारों की ओर से जनता को राहत देने की कोई कवायद नहीं की जा रही है।
केंद्र व राज्य पेट्रोलियम पदार्थों पर बेहिसाब टैक्स लगाकर अपना खजाना भरते हैं। यहां तक कि जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दामों में भारी गिरावट आई तो सरकार ने उसका लाभ उपभोक्ताओं को नहीं दिया। आयात शुल्क की समीक्षा करके इसे फिर से तय किया जाए ताकि आयात की जाने वाली जरूरी वस्तुएं सस्ती हो सकें।
