बरेली: शहर के सिनेमा प्रेमियों की पहली पसंद था जगत टॉकीज

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Edited By Amrit Vichar
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बरेली, मोनिस खान। बरेली में सिनेमा घरों का अपना इतिहास रहा है। यह उस जमाने की बात है जब स्मार्ट फोन तो दूर कई लोगों के घरों में टीवी भी नहीं थे। यही वजह थी कि सिनेमा की दीवानगी लोगों के सिर चढ़कर बोलती थी। लोग बताते हैं कि एक आने, दो आने, तीन आने …

बरेली, मोनिस खान। बरेली में सिनेमा घरों का अपना इतिहास रहा है। यह उस जमाने की बात है जब स्मार्ट फोन तो दूर कई लोगों के घरों में टीवी भी नहीं थे। यही वजह थी कि सिनेमा की दीवानगी लोगों के सिर चढ़कर बोलती थी। लोग बताते हैं कि एक आने, दो आने, तीन आने और चार आने के टिकट पर सुपरहिट फिल्मों के शो देख लिया करते थे। जमाना बदला और सिनेमा प्रेमियों ने सिंगल स्क्रीन से लेकर मल्टीप्लैक्स तक का सफर तय किया मगर आज इन सिनेमाघरों में पुरानी फिल्मों के अलावा कुछ है तो केवल सुनहरा इतिहास।

शहर के बीचों-बीच स्थित जगत सिनेमा शहर के सबसे पुराने थियेटर्स में से एक है। साल 1954 में पहली बार राजकपूर की फिल्म बरसात को जगत सिनेमा के पर्दे पर रिलीज किया गया। इसके बाद बड़ा बाजार में मौजूद यह सिनेमा शहर वालों की पहली पसंद बन गया। पचास के दशक से शुरू हुआ यह सिलसिला एक जमाने तक ठीकठाक चला। मुगले आजम और नदिया के पार जैसी फिल्मों ने खूब कमाई की। 90 के दशक तक स्थिति यह थी कि लोग मैटिनी शो का टिकट लेने आते थे मगर घंटों लाइन में लगने के बाद नाइट शो का भी टिकट नहीं मिल पाता था।

इंतजार के वक्त पोस्टर्स को निहारने का अपना अलग मजा था। लोगों की भीड़ के ऊपर चढ़कर बॉक्स ऑफिस की खिड़की में टिकट के लिए हाथ घुसा देने वाले सिनेमा प्रेमी भी जगत टॉकीज ने देखे हैं मगर यह सब गुजरे जमाने की बात हो गई। पुरानी रील प्रोजेक्टर मशीन को छोड़कर यूएफओ तकनीक से फिल्मों की स्क्रीनिंग शुरू की गई। इसके बाद ओटीटी और मल्टीप्लेक्स ने सिनेमाघरों को बड़ी चोट पहुंचाई। स्थिति यह है कि आज जगत सिनेमा में पुरानी फिल्मों को दिखाकर काम चलाया जा रहा है। स्टाफ और सिनेमाघर के दूसरे खर्चे भी बमुश्किल निकल पाते हैं। रही-सही कसर कोरोना ने पूरी कर दी।

पुरानी प्रोजेक्टर मशीन के साथ खड़े ऑपरेटर रामचंद्र

नहीं हटाया 1954 का रील प्रोजेक्टर
पर्दे पर हजारों फिल्मों की स्क्रीनिंग कर चुकी करीब 67 साल पुरानी वेस्टेक की प्रोजेक्टर मशीन यादगार के तौर पर आज भी जगत सिनेमा में लगी है। फिल्मों की स्क्रीनिंग भले ही यूएफओ से की जाती हो मगर मैनेजर मोहम्मद वासिल बताते हैं कि इस प्रोजेक्टर के साथ कई यादें जुड़ी हैं। 1954 में राजकपूर की बरसात फिल्म का पहला शो इसी मशीन से दिखाया गया था। नई तकनीक आने के बाद शहर के सभी थियेटर्स से पुराने प्रोजेक्टर हटा दिए गए मगर जगत टॉकीज इकलौता सिनेमाघर है जहां इस पुरानी याद को संजोकर रखा गया है। उस जमाने में पुर्जे खराब होने पर पंजाब से मंगाए जाते थे। पहले दो सेट थे मगर अब केवल एक यादगार के लिए रखा है।

जगत सिनेमा में रखी जय संतोषी मां फिल्म के लिए मिली ट्रॉफी

महिलाओं के लिए चलता था अलग शो
1975 में फिल्म आई थी जय संतोषी मां और जगत सिनेमा में फिल्म का प्रदर्शन हुआ मगर फिल्म रिलीज होने के बाद जगत सिनेमा का माहौल पूरे 25 हफ्ते तक भक्तिमय रहा। बताते हैं कि श्रद्धा और आस्था का आलम यह था कि लोग चप्पल उताकर फिल्म देखने आते थे। इंटरवेल में स्टाफ की ओर से प्रसाद के तौर पर दर्शकों को गुड़दानी दी जाती थी। फिल्म के प्रदर्शन के दौरान रोजाना एक शो केवल महिलाओं के लिए रखा गया था। 25 हफ्ते तक फिल्म चलती रहने के लिए जगत सिनेमा को मिली ट्रॉफी आज भी यहां मौजूद है।

  • 1954 का जापानी प्रोजेक्जर बरेली में सिनेमाघरों के सुनहरे इतिहास की दिलाता है याद
  • 25 हफ्ते लगी थी जय संतोषी मां फिल्म, इसके लिए सिनेमाघर को मिली थी ट्रॉफी

1984 से जगत सिनेमा में मैनेजर हूं। पहले दिल्ली स्थित बीआर चोपड़ा के दफ्तर में वितरक प्रतिनिधि था। मौजूदा वक्त में सिनेमा घरों की हालत खराब है। जैसे-तैसे खर्चे निकालकर काम चला रहे हैं। एक जमाना था कि जब फिल्म का प्रिंट आता था तो वितरक प्रतिनिधि को लेने स्टेशन जाते थे। सिनेमा को लेकर अलग ही किस्म का माहौल होता था मगर अब स्थिति पहले जैसी नहीं रही। सिनेमा घर कारोबार से जुड़े लोग भुखमरी की कगार पर है।

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