बरेली: ‘आरडीएक्स’ और ‘एके 47’ मांझा भी जानलेवा, ब्लैक में मिल रही चरखियां

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Edited By Amrit Vichar
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बरेली, अमृत विचार। पुलिस की ढिलाई के चलते चाइनीज, शीशायुक्त मांझा समेत अन्य खतरनाक मांझा भी बरेली शहर की गलियों में बेखौफ बिक रहे हैं। इसलिए पतंगबाजी पर भी रोक नहीं लग पा रही है। मांझा की बिक्री की पड़ताल करने के दौरान गुरुवार को ‘अमृत विचार’ को कई अहम तथ्य मिले। घातक चाइनीज, शीशायुक्त …

बरेली, अमृत विचार। पुलिस की ढिलाई के चलते चाइनीज, शीशायुक्त मांझा समेत अन्य खतरनाक मांझा भी बरेली शहर की गलियों में बेखौफ बिक रहे हैं। इसलिए पतंगबाजी पर भी रोक नहीं लग पा रही है। मांझा की बिक्री की पड़ताल करने के दौरान गुरुवार को ‘अमृत विचार’ को कई अहम तथ्य मिले। घातक चाइनीज, शीशायुक्त मांझा के साथ अब ‘आरडीएक्स’ और ‘एके 47’ नाम का मांझा भी सामने आया। आसमान में जो पतंगबाजी हो रही है, वह इसी नाम के मांझे से हो रही है।

एक और बात सामने यह आई कि चाइनीज मांझा तो यू हीं बदनाम है। सर्वाधिक हादसे शीशायुक्त मांझे से रहे हैं। आरडीएक्स और एके 47 जैसे नामों से देसी मांझे की चरखी शहर से लेकर अन्य राज्यों में ब्लैक में बेची जा रही हैं। 500 रुपये से लेकर 700 रुपये में मिलने वाली शीशायुक्त चरखी पुलिस सख्ती के बाद 3500 और 4000 रुपये में ब्लैक में बेची जा रही है। पतंगबाजी के शौकीन ये रकम खर्च कर चरखियां खरीद रहे हैं। बताते हैं कि पतंगबाज शर्त लगाकर पेच लड़ा रहे हैं। नोट कमाने के लालच में लोग मांझे की चपेट में आकर घायल हो रहे हैं।

मांझे से लोगों के घायल होने के बाद एक और मांझा चर्चा में आया है, जिस मांझे को धार देने के लिए कारीगर बारूद का इस्तेमाल करते हैं। बेहद खतरनाक यह मांझा चाइनीज (सिंथेटिक ) मांझे की तरह नुकसान पहुंचाता है। किला के बाकरगंज और जखीरा में बनने वाले इस मांझे के नाम भी बारूद पर रखे जाते हैं।

मसलन, आरडीएक्स, एके 47, खूनी मांझा, आसमानी धमाका, ब्लेड जैसी धार वाला मांझा। मांझे के काम से जुड़े लोगों का कहना है कि करीब 20 साल पहले देशी मांझे की डिमांड इतनी ज्यादा थी कि कारीगर उसे पूरा नहीं कर पाते थे। मगर चाइना का मांझा चलन में आने के बाद इसके काम पर कुछ मंदी हो गई। मगर अभी शहर में करीब हर रोज एक करोड़ रुपए का देसी मांझा तैयार कर दूसरे राज्यों के साथ शहर में भी सप्लाई किया जा रहा है।

मांझा बनाने वाले कारीगरों के हाथ भी हो जाते हैं जख्मी
मांझा कारोबारी मांझा बनाने बनाने से पहले उसमें शीशे के साथ अन्य खतरनाक केमिकल मिलाते हैं। इस बजह से मांझा सूतते समय हाथ में उनके लकीरें पड़ जाने से जख्म बन जाते हैं। जिसके चलते उन्हें खाना खाने में भी दिक्क्तों का सामना करना पड़ता है।

शहर में यह हैं मांझा कारोबार के गढ़

जसौली, वाकरगंज, स्वालेनगर, किला, हजियापुर, विशारतगंज, नवदिया, सनौआ, बुधौलिया, सीबीगंज, सनैया, मिलक, सैदपुर आदि।

शर्त लगाकर हो रही पतंगबाजी
शहर में वैसे तो बहुत से लोग पतंगबाजी शौक के लिए करते हैं मगर बताया जा रहा है कि शहर के बाकरगंज, किला, नवदिया और पुराना शहर समेत सुभाषनगर में युवा शर्त लगाकर पतंगबाजी कर रहे हैं। शर्त न हार जाएं, इसलिए वह खतरनाक मांझे का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे हमेशा हादसा होने का डर बना रहता है।

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