काशी में अश्वेत अश्व दान की है अनूठी परंपरा…जानें
वाराणसी। पितरों की मुक्ति के निमित्त गऊ दान, स्पर्ण दान, रजत दान, अन्न दान, दक्षिणा दान आदि के बारे में तो सभी जानते हैं। लेकिन यह कम लोग जानते हैं कि पितरों से अपने कल्याण का आशीष प्राप्त करने के लिए अश्वेत अश्वदान की परंपरा भी है। इस परंपरा का पालन सिर्फ और सिर्फ काशी …
वाराणसी। पितरों की मुक्ति के निमित्त गऊ दान, स्पर्ण दान, रजत दान, अन्न दान, दक्षिणा दान आदि के बारे में तो सभी जानते हैं। लेकिन यह कम लोग जानते हैं कि पितरों से अपने कल्याण का आशीष प्राप्त करने के लिए अश्वेत अश्वदान की परंपरा भी है। इस परंपरा का पालन सिर्फ और सिर्फ काशी के पिशाचमोचन तीर्थ पर होता है।
वर्तमान में भले ही परंपरा के निर्वाह के नाम पर एक ही अश्वेत अश्व का दान पितृपक्ष में सैकड़ों लोग करते हों, लेकिन एक वक्त ऐसा भी था जब लोग वास्तव में घोड़ों का दान किया करते थे।
तीर्थपुरोहित पं. आदित्यशंकर भट्ट बताते हैं कि उनके परदादा और दादा के जमाने में उनके घर में गोशाला और अश्वशाला दोनों हुआ करती थी। यहां तक कि मेरे पुत्र की युवा अवस्था तक हमारे परिवार के लोग लालटेन लगे इक्कों की सवारी किया करते थे। बढ़ती महंगाई में के दौर में गऊदान हो या अश्वदान हो लोग सिर्फ कोरम ही पूरा करते हैं।
उन्होंने बताया कि पिशाच मोचन तीर्थ पर अश्वेत अश्वदान की परंपरा बहुत ही प्राचीन है। अब से करीब सौ साल पहले तक इस तीर्थ पर ओझाओं का साम्राज्य हुआ करता था। जिस प्रकार नाग पंचमी पर दूर दूर से सपेरे महुअर खेलने के लिए बनारस आया करते थे। ठीक उसी प्रकार पितृपक्ष में देश भर के ओझाओं का जमावड़ा पिशाच मोचन तीर्थ पर हुआ करता था। अश्वदान की परंपरा के तार भी उसी से जुड़े हैं।
