बरेली: टूटी सड़कों पर कराह रहे वाहन, जनप्रतिनिधि फिर भी बने रहे अंजान

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बरेली, अमृत विचार। कहते हैं कि विकास की गति सड़कों से पता चलती है, लेकिन रूहेलखंड की सड़कों की हालत बेहद ही जर्जर है। जर्जर सड़कों की वजह से ही हादसों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। हालात यह है कि बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर, पीलीभीत और लखीमपुर में सड़क हादसों की संख्या एक हजार …

बरेली, अमृत विचार। कहते हैं कि विकास की गति सड़कों से पता चलती है, लेकिन रूहेलखंड की सड़कों की हालत बेहद ही जर्जर है। जर्जर सड़कों की वजह से ही हादसों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। हालात यह है कि बरेली, बदायूं, शाहजहांपुर, पीलीभीत और लखीमपुर में सड़क हादसों की संख्या एक हजार से अधिक हो गई। इन हादसों में हजारों मांओं की गोद सूनी हो गई, तो इतनी ही महिलाओं का सुहाग उजड़ गया।

यही नहीं हजारों बच्चों के सिर से पिता और मां का साया हमेशा के लिए उठ गया। ऐसा नहीं है कि इन हादसों में सामान्य लोगों की ही मौत हुई हो, बरेली-लखनऊ राष्ट्रीय राजमार्ग पर हुए हादसों में जहां उत्तराखंड के एक मंत्री के बेटे की मौत वर्ष 2020 में हो गई थी। वहीं आयकर अधिकारी व उनके साथ के तीन लोगों की भी हादसों में जान जा चुकी है। इसके बाद भी बरेली लखनऊ हाईवे पर निर्माण कार्य अधूरा है। वहीं उक्त जिलों की तमाम सड़कें गुड्ढा मुक्त होने का इंतजार कर रही हैं। सड़कों को गड्ढा मुक्त कराने के लिए कई बार क्षेत्रीय लोगों ने आवाज भी उठाई, लेकिन उनकी आवाज को अनुसना कर दिया गया। स्थानीय लोगों की माने तो कमीशन के फेर में भी सड़कों का निर्माण अधर में लटक गया। जर्जर सड़कों और हादसों पर पेश है ओमेन्द्र सिंह की रिपोर्ट—

कुछ दिन बाद भूल गए गुड्ढा मुक्त अभियान
वर्ष 2017 में मुख्यमंत्री बनने के बाद ही योगी आदित्यनाथ ने सूबे की सड़कों को गड्ढा मुक्त करने का फरमान जारी कर दिया था। उस वक्त यह फरमान धरातल पर भी दिखाई दिया। पीडब्ल्यूडी के अधिकारी सड़कों के गड्ढों को भरने के लिए जुट गए। इसके बाद धीरे धीरे यह अभियान बंद हो गया। कुछ दिनों बाद दोबारा सड़कों में गड्ढे हो गए। इन गड्ढों में गिरने से एक दो नहीं बल्कि हजारों लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे।

गुणवत्ता पर नहीं दिया ध्यान
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के फरमान के बाद सड़कों को गड्ढा मुक्त करने के लिए जोरशोर से अभियान शुरू किया गया, लेकिन यह अभियान कुछ ही दिनों में बंद हो गया। जहां जहां गड्ढे भरे गए थे। उनमें गुणवत्ता की काफी कमी थी। बताते हैं कि कमीशन के चक्कर में ठेकेदारों ने तारकोल कम मात्रा में डाला था। ऐसे में बजरी पड़ने के कुछ दिनों बाद ही उखड़ गई थी। जिससे दोबारा गड्ढे हो गए। जर्जर सड़कों पर हजारों लोग घायल हो गए।

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