मुरादाबाद : वैचारिक जंग में हरदम प्रभावी रहा ‘भगवा’ झंडा

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आशुतोष मिश्र/अमृत विचार। शहर विधानसभा सीट गंगा-जमुनी रिश्तों की जमानत है। यहां हिंदू की तुलना में मुस्लिम आबादी अधिक है। लेकिन, चुनावी नतीजे भगवा झंडे के पक्ष में अधिक आए हैं। इसके पीछे लोगों में बेहतर तालमेल और कारोबारी रिश्ते हैं। वैसे भी सियासत ने कई बार धार्मिक और सामाजिक ताना-बाना खराब करना चाहा। मगर …

आशुतोष मिश्र/अमृत विचार। शहर विधानसभा सीट गंगा-जमुनी रिश्तों की जमानत है। यहां हिंदू की तुलना में मुस्लिम आबादी अधिक है। लेकिन, चुनावी नतीजे भगवा झंडे के पक्ष में अधिक आए हैं। इसके पीछे लोगों में बेहतर तालमेल और कारोबारी रिश्ते हैं। वैसे भी सियासत ने कई बार धार्मिक और सामाजिक ताना-बाना खराब करना चाहा। मगर लोगों की आपसी मोहब्बत भारी पड़ी।

बेहतर तालमेल

  • सियासत ने कई बार खराब करना चाहा धार्मिक-सामाजिक ताना-बाना
  • ऐसा करने वालों पर भारी पड़ी यहां के लोगों की आपसी मोहब्बत

धारा के प्रतिकूल चुनावी इतिहास लिखने वाले यहां के मतदाताओं ने समाज को मजबूत डोर में बांधे रखा। रिश्तों की तुरपाई उधेड़ने की कोशिश हर बार कामयाब नहीं हो पाई। पहले आम चुनाव (1951) में कांग्रेस के उम्मीदवार को सफलता मिली। लेकिन, 17 बार के चुनाव में भगवा विचार के चेहरे अधिक पसंद किए गए। कांग्रेसी, सोशलिस्ट, समाजवादी और भाजपा की वैचारिकी की यहां हर बार लड़ाई हुई। सुखद यह कि यहां के मतदाताओं ने आपसी रिश्ते में सियासत को फूट डालने की जगह नहीं दी। इस क्षेत्र में मुस्लिमों की आबादी 55 और हिंदुओं की 45 प्रतिशत है। कई बार वैश्य मतदाता निर्णायक हो चुके हैं।

कारोबारी मेलजोल से यहां का संसदीय इतिहास सजता-संवरता है। विश्व भर में मुरादाबाद पीतल उद्योग के कारण मशहूर है। यहां से विश्व भर में प्रति वर्ष नौ से 10,000 हजार करोड़ रुपये का निर्यात किया जाता है। नगर विधानसभा में शामिल ज्यादातर वोटर पीतल कारोबार से जुड़े हुए हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार यहां पांच लाख से ज्यादा मतदाता हैं। अबकी करीब 8.1 लाख मतदाता अपने विधायक का चुनाव करेंगे। यहां दूसरे चरण में 14 फरवरी को मतदान होना है।

ये दल और ऐसे चेहरे बने पसंद
शहर विधानसभा में 1951 से 2017 तक 17 विधानसभा चुनाव हुए हैं। चार बार कांग्रेस (चार), निर्दलीय (दो), आरपीआई (एक), भारतीय जनसंघ (एक), जनता पार्टी (एक), जनता दल (दो), भाजपा (चार )और समाजवादी पार्टी (देा) से विधायक चुने जा चुके हैं। इस सीट पर वैश्य समाज का दबदबा रहा है। चुनाव में 10 बार वैश्य समाज से विधायक चुनकर विधानसभा तक पहुंचे हैं।

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