यूपी चुनाव 2022: क्या नेताजी की विरासत संभाल पाएंगे अखिलेश, यह है चुनौती…
लखनऊ। समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव तीन दशकों तक प्रदेश एवं देश में कांग्रेस विरोधी राजनीति के प्रमुख चेहरा रहे हैं। ठेठ देसी अंदाज में राजनीति करने वाले समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायक सिंह को इसी वजह से उनके समर्थक नेताजी के नाम से पुकारते हैं। 1990 के दशक की शुरूआत में जब तीसरा मोर्चा …
लखनऊ। समाजवादी नेता मुलायम सिंह यादव तीन दशकों तक प्रदेश एवं देश में कांग्रेस विरोधी राजनीति के प्रमुख चेहरा रहे हैं। ठेठ देसी अंदाज में राजनीति करने वाले समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायक सिंह को इसी वजह से उनके समर्थक नेताजी के नाम से पुकारते हैं।
1990 के दशक की शुरूआत में जब तीसरा मोर्चा भानुमति के कुनबे की तरह बिखर गया था तो मुलायम सिंह यादव ही ऐसे नेता थे, जिन्होंने एक साथ कांग्रेस और भाजपा जैसे बड़े दलों से मुकाबला कर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की स्थापना की। शायद इसी वजह से वह तीन बार प्रदेश के मुख्यमंत्री बनें। इसके अलावा केंद्र में रक्षा मंत्री के पद संभाला।
मुलायम सिंह बन सकते थे प्रधानमंत्री
वह तो किस्मत ने साथ नहीं दिया वरना देश के प्रधानमंत्री पद पर भी सुशोभित होते। हालांकि 2012 में अपने बूते पार्टी को प्रचंड बहुमत दिलाने के बाद उन्होंने अपने बेटे अखिलेश यादव को अपनी विरासत सौंपते हुए मुख्यमंत्री और पार्टी का अध्यक्ष बना दिया। तब से अखिलेश पिता की राजनीतिक विरासत को संजोने में जुटे हुए हैं। आसन्न विधानसभा चुनाव यह तय करेगा कि अखिलेश विरासत को कितना संभाल पाएं।
दो दशकों में फर्श से अर्श तक का सपा ने तय किया सफर
मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में 1992 को समाजवादी विचारक राममनोहर लोहिया और आचार्य नरेंद्र देव की विचारधारा पर समाजवादी पार्टी की स्थापना हुई। उनके नेतृत्व में ही वर्ष 2009 में लोकसभा की 23 सीटों के साथ सपा देश की तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक दल बनी। स्थापना के एक वर्ष बाद ही 1993 में हुए विधानसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन कर उन्होंने चुनाव लड़ा।
जिसमें सपा को 109 और बसपा को मिलीं 67 सीटें मिली, 117 सीटे जीतने के बाद भी भाजपा को विपक्ष में बैठना पड़ा और मुलायम मुख्यमंत्री बने। वैसे इससे पूर्व मुलायम 1989 में पहली बार मुख्यमंत्री बन चुके थे लेकिन कांग्रेस के समर्थन वापस लेने की वजह से उनकी सरकार कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। 1996 में मुलायम सिंह मैनपुरी से सांसद चुने गए और केंद्र में संयुक्त मोर्चा की सरकार में रक्षामंत्री बने थे।
बसपा विधायकों को तोड़कर संभाली कमान
प्रदेश में बसपा-भाजपा गठजोड़ से बनी भाजपा सरकार में सेंधमारी करते मुलायम सिंह ने वर्ष 2003 में बसपा में बगावत कर मुलायम सिंह एक बार फिर मुख्यमंत्री बने। उनकी इस सरकार को बसपा के बागी विधायकों, रालोद, कल्याण सिंह की पार्टी, निर्दलीयों, सीपीएम और कांग्रेस के विधायकों का समर्थन मिला। जिसकी वजह से चार वर्षों यानि 2007 तक मुख्यमंत्री रहे। हालांकि वर्ष 2007 में उनके नेतृत्व में 97 सीटे जीतने के बाद भी समाजवादी पार्टी को करारी शिकस्त मिली। पांच वर्षों तक संघर्ष कर 2012 में उन्होंने सपा को 212 सीटों पर जीत दिलाई। हालांकि इस दौरान उन्होंने अपने पुत्र अखिलेश को उत्तराधिकारी मानते हुए मुख्यमंत्री बनाया। यह सरकार पांच साल चली।
बैसाखियों के सहारे अखिलेश मैदान में उतरे
वर्ष 2017 का विधानसभा चुनाव समाजवादी पार्टी ने अखिलेश यादव के चेहरे पर लड़ा। इस चुनाव तक पार्टी के अध्यक्ष का पद भी अखिलेश के पास आ गया। सपा ने कांग्रेस के साथ गठबंधन करते 311 सीटों पर प्रत्याशियों को खड़ा किया लेकिन कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ना उनको महंगा पड़ गया। बेमेल गठबंधन को लोगों ने खारिज कर दिया।
परिणामस्वरूप सपा के महज 47 प्रत्याशी ही विधानसभा पहुंचने में कामयाब हो सके। 2019 में लोकसभा चुनाव सपा ने अखिलेश यादव के नेतृत्व में लड़े। इस चुनाव में उनकी पार्टी ने एक बार फिर बसपा और रालोद के साथ गठबंधन किया। हालांकि इस गठबंधन को भी मतदाता पचा नहीं पाए और सपा के महज पांच प्रत्याशी ही चुनाव जीत सके। उसमें भी मुलायम, अखिलेश, आजम, डा. एसटी हसन और शफीकुर्रहमान बर्क है। अब एक बार फिर 2022 के विधानसभा चुनावों में रालोद के साथ गठबंधन कर अखिलेश चुनाव मैदान में उतर रहे हैं।
यू टर्न वाले मुख्यमंत्री की छवि ने बिगाड़ा खेल
अखिलेश यादव पांच साल तक मुख्यमंत्री रहे हैं। इस दौरान युवा मुख्यमंत्री की छवि ने समर्थकों के बीच जबरदस्त लोकप्रियता दिलाई लेकिन नौकरशाही ने उनको अपरिपक्व मानते हुए अपनी उंगलियों पर नचाना शुरू कर दिया। कई बार उनको अपने फैसलों पर यू टर्न लेना पड़ा। चाहें रात को मॉल्स के खुलने का समय पहले कम करने और उसके बाद दबाव में इस फैसले को वापस लेने का मामला हो या फिर दर्जा प्राप्त मंत्रियों को काम देने का मसला, कहीं भी अखिलेश की नहीं चली।
सौ के करीब दर्जा प्राप्त मंत्री बने लेकिन इसमें अखिलेश के वफादारों की संख्या उंगलियों पर गिने जाने लायक भी नहीं थी। इस मामले में भी अखिलेश को मुंह की खानी पड़ी। बाद में इन्हें हटाना भी पड़ गया। इसी तरह से मुजफ्फरनगर दंगों के समय भी अखिलेश की एक नहीं चली। खैर,यह वह समय था जब सपा के बुजुर्ग नेताओं के कारण अखिलेश की युवा छवि धूमिल होती जा रही थी। विधान सभा चुनाव के समय आगे बढ़कर समाजवादी पार्टी का नेतृत्व करने वाले अखिलेश की लाचारी देखकर चर्चा यह छिड़ गई कि अखिलेश में मुलायम की विरासत संभालने की कूबत नहीं है।
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