रामपुर : गली-मोहल्लों में नहीं गूंज रहे जिंदाबाद के नारे

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सुहेल जैदी/अमृत विचार। आजादी के बाद से संभवत: यह पहला चुनाव है, जब गली-मोहल्लों में बच्चों और बड़ों के लोक लुभावन नारे नहीं गूंज रहे हैं। चुनाव आयोग की टेढ़ी नजर होने पर एहतियात बरती जा रही है। प्रत्याशियों द्वारा चुनाव प्रचार में मनमानी करने पर उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज हो रहे हैं। प्रत्याशियों को …

सुहेल जैदी/अमृत विचार। आजादी के बाद से संभवत: यह पहला चुनाव है, जब गली-मोहल्लों में बच्चों और बड़ों के लोक लुभावन नारे नहीं गूंज रहे हैं। चुनाव आयोग की टेढ़ी नजर होने पर एहतियात बरती जा रही है। प्रत्याशियों द्वारा चुनाव प्रचार में मनमानी करने पर उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज हो रहे हैं। प्रत्याशियों को गुजरा जमाना याद आ रहा है, जब नेताओं के पीछे जीतेगा भई जीतेगा जैसे नारों से फिजा गूंज उठती थी और पूरे मोहल्ले या गांव में नेता जी का टैंपो हाई हो जाता था। लेकिन, इस बार चुनाव प्रचार का मामला बिल्कुल जुदा है। कोरोना की तीसरी लहर के चलते चुनाव आयोग ने प्रत्याशियों पर शिकंजा कस दिया है। वहीं चुनावी शोर पर अंकुश से आम लोगों को खासी राहत मिली है।

चुनाव आते ही गांवों-मोहल्लों में निठल्ले रहने वालों को काम मिल जाता था। प्रत्याशियों के चुनाव की कमान ऐसे ही लोगों के हाथों में रहती थी। टैंपो बनाने के लिए बच्चों को चुनाव चिह्न के बिल्ले और झंडे बांटे जाते थे। वाहनों के काफिले आने पर बच्चे जोर-जोर से नारे लगाने शुरू कर देते थे। मजेदार बात यह होती थी कि बच्चों के टी शर्ट या बनियान पर तमाम दलों के बिल्ले लगे होते थे। चुनाव कार्यालयों के लिए प्रभारी बनाए जाते थे, जो पूरे मोहल्ले या गांव में चुनाव सामग्री लगवाने से लेकर लोगों को हमेशा अपने प्रत्याशी के साथ जोड़ने का काम करते थे। जिस प्रत्याशी के साथ जितनी अधिक भीड़ होती थी, उसका टैंपो उतना ही हाई समझा जाता था। लेकिन, मौजूदा चुनाव बिल्कुल अलग है। अब प्रत्याशी के साथ निर्धारित लोगों से अधिक लोग या वाहन होने पर मुकदमा दर्ज होगा।

शहर के मोहल्ला पुराना गंज निवासी 65 वर्षीय हफीज खां बताते हैं कि वहां पर तमाम पार्टियों के कार्यालय खुलते थे और लाउडस्पीकरों के शोर में कुछ और सुनाई नहीं देता था। दुकानदार परेशान रहते थे क्योंकि ग्राहक मांगता कुछ था और सुनाई नहीं देने पर वे सामान कुछ दे देते थे। एक दूसरे की टक्कर पर लाउडस्पीकर पर शोर मचता था। इसके अलावा लाउडस्पीकर लगी रिक्शाएं भी गलियों में घूमा करती थीं, जिनके पीछे-पीछे बच्चे दौड़ते थे।

झंडे बिल्लो के करोबार पर भी संकट
शहर में चूने वाले फाटक और मिस्टनगंज में चुनाव चिहुन झंडे बैनर बिकते थे, इस बार वो सब कहीं दिखाई नहीं दे रहा। दुकानदारों का कहना है कि पहले से ऑर्डर देकर थोक में माल मंगाते थे। राष्ट्रीय पार्टियों के माल पहले आ जाते थे। लेकिन, इस बार डर के कारण झंडे नहीं मंगाए कि रैलियां नहीं होंगी तो उन्हें खरीदेगा कौन। इस बार चुनाव के प्रचार में बदलाव से यह कारोबार भी ठप हो गया है।

लाउडस्पीकर वालों काठप हुआ कारोबार
बाबू साउंड सर्विस के संचालक बाबू भाई कहते हैं कि चुनाव आयोग की सख्ती के चलते लाउडस्पीकर वालों का कारोबार ठप है। चुनावी सभाओं में साउंड सर्विस का भी बड़ा कमाल होता था। अच्छी साउंड होने पर लोग चुंबक की तरह जनसभा में खिंचे चले आते थे। इसके अलावा नुक्कड़ सभाओं में भी लाउड स्पीकर का धड़ल्ले से इस्तेमाल होता था। हैलो-हैलो की आवाज सुनते ही मोहल्ले या गांव के लोगों में जिज्ञासा उत्पन्न होती थी कि आज किस पार्टी का जलसा है।

बैंड वाले भी काम नहीं मिलने से निराश, नहीं हो रही बुकिंग
मस्ताना बैंड के मास्टर रफीक कहते हैं कि प्रत्याशियों के गांव या मोहल्ले में प्रवेश करते ही बैंड की धुन पर उनका स्वागत किया जाता था। प्रत्याशी को किसी बग्गी या खुले वाहन में बैठाया जाता था। आगे-आगे बैंड की धुन पर बच्चे नाचते हुए चलते थे। लेकिन, इस बार कोरोना के कारण तमाम जलसे-जुलूसों पर पाबंदी होने के कारण बैंड वाले खासे निराश हैं।

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