कंकरीट के जंगल
खपरैली दुनिया अब जाने कहां गई? कंकरीट के जंगल सबको निगल रहे। मौसम भी जाने क्यों आंख तरेरे सा। पर्वत और दिशाओं के मन पिघल रहे। लगता सब कुछ शीघ्र बदलने वाला है। पन्नों को इतिहास पलटने वाला है। कुछ चेहरे फिर भीड़ से आगे निकल रहे। सच्चाई क्यों स्वप्नभंग सी लगती है। अच्छाई भी …
खपरैली दुनिया
अब जाने
कहां गई?
कंकरीट के
जंगल सबको
निगल रहे।
मौसम भी
जाने क्यों
आंख तरेरे सा।
पर्वत और
दिशाओं के मन
पिघल रहे।
लगता सब कुछ
शीघ्र
बदलने वाला है।
पन्नों को
इतिहास
पलटने वाला है।
कुछ चेहरे फिर
भीड़ से आगे
निकल रहे।
सच्चाई क्यों
स्वप्नभंग सी
लगती है।
अच्छाई भी
मन ही मन
क्यों घुटती है?
अपनों में
रहकर भी बेहद
विकल रहे।
पंकज मिश्र ‘अटल’
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