उन्नाव: जिले में विलुप्त होती जा रही फाग गायन की परम्परा, होली पर रहा है इस रिवाज का विशेष महत्व
उन्नाव। शिशिर की कपकपाती ठंड और हेमन्त के पतझड़ के पश्चात प्रकृति में जब नवचेतना का संचार एवं अंकुरण प्रारम्भ होता है तब जड़ चेतन सभी एक नवीन ऊर्जा एवं जीवनरस के आप्लावन का अनुभव करने लगते हैं। ऋतुराज बसंत के आगमन का सांस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक व आध्यात्मिक विशिष्ट महत्व है। बसंत पंचमी का शिशु …
उन्नाव। शिशिर की कपकपाती ठंड और हेमन्त के पतझड़ के पश्चात प्रकृति में जब नवचेतना का संचार एवं अंकुरण प्रारम्भ होता है तब जड़ चेतन सभी एक नवीन ऊर्जा एवं जीवनरस के आप्लावन का अनुभव करने लगते हैं। ऋतुराज बसंत के आगमन का सांस्कृतिक, सामाजिक, साहित्यिक व आध्यात्मिक विशिष्ट महत्व है। बसंत पंचमी का शिशु बसंत फाल्गुन पूर्णिमा तक पूर्ण यौवन को प्राप्त कर चुका होता है।
इसी दिन सम्पन्न होने वाले नवशस्येष्टि यज्ञ को होली के नाम से जानते हैं। कृषक प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करते हुए गायन व वादन करते हुए अपने आनन्द, उत्साह व उमंग में उत्सव को मनाता है।
इस अवसर गाए जाने वाले पदों को फाग कहा जाता है। होलिका दहन स्थल से ढोल, मृदंग, झांझ व मंजीरा बजाते हुए ग्रामीण किसी देव स्थल से अपनी फाग यात्रा को प्रारम्भ करके गांव के प्रत्येक व्यक्ति के द्वार पर गायन वादन करते हुए जाते हैं। लोग सारे द्वेष व कटुता को भूल आपसी भाईचारा का संदेश देते हैं।
फाग गीतों में भारत की संस्कृतिक, धार्मिक तथा पारम्परिक रीति-रिवाजों की झलक देखने को मिलती है। विभिन्न देवी-देवताओं के पौराणिक व काल्पनिक चित्रण कर फाग गीतों की रचना की जाती है। अनेक गीतकार समय-समय पर अपने गीतों के माध्यम से इस में रंग भरने का कार्य करते रहे हैं।
युग परिवर्तन एवं आधुनिकीकरण में यह परंपरा क्षीण हो चली है। जहां पहले ऐसे कार्यक्रमों को आयोजित करने के लिए आयोजकों की होड़ लगी रहती थी तथा स्थल पर भी श्रोताओं की भारी भीड़ मौजूद रहती थी। आधुनिक मनोरंजन के साधनों में संलिप्त युवा वर्ग इस प्राचीन संस्कृति की उपेक्षा करते प्रतीत होते हैं। पुराने फाग गायक बढ़ती उम्र और शारीरिक अक्षमता के कारण असहाय हो चले हैं। उन्हें इस परंपरा के निर्वहन करने वाले नहीं मिल रहे हैं।
जिन फाग गीतों का गायन पूर्व में बसंत पंचमी से प्रारंभ हो जाता था वह सिमट कर होली में एक-दो दिन तक ही रह गया है। कहीं-कहीं तो होलिका दहन की रात को ही कुछ गिने चुने लोगों द्वारा यह मनाया जाता है। क्षेत्र में फाग गीतों को गाने वालों की संख्या भी नाममात्र ही रह गई है। ऐसे में फगुआ गीत क्षेत्र से विलुप्त होते जा रहे हैं और एक प्राचीन संस्कृति भी क्षेत्र से विलुप्त होती प्रतीत हो रही है।
क्या कहते हैं जनपद के साहित्यकार
‘‘हर याद पुरानी कथा बन जाती है,
हर टूटे दिल की टेक वही बन जाती है।‘‘
फाल्गुन मास दो ऋतुओं का संधिकाल है मौसम मादक होता है। आमजन आपस में भावनात्मक कीचड़ उडे़लते हैं। फाग के माध्यम से पारस्परिक सौहार्द बढ़ता है जो अब धीरे-धीरे लुप्त होता प्रतीत हो रहा है।
-डा. महेश चन्द्र मिश्र ‘विधु‘, वरिष्ठ आलोचनाकार।
फाग गायन की परम्परा लुप्तप्राय सी हो गई है। नगरीय क्षेत्रों में होली पर हास्य-व्यंग के कवि सम्मेलनों ने कुछ जोर अवश्य पकड़ा है। उल्लास संचारी फाग गायन को पुर्नजीवित कर होली के इस प्रेम पर्व को मनाना चाहिए।
-डा. विनय शंकर दीक्षित ‘आशु‘, प्रसिद्ध राष्ट्रीय कवि।
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