दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं

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Edited By Amrit Vichar
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दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं सब अपने चेहरों पे दोहरी नक़ाब रखते हैं हमें चराग़ समझ कर बुझा न पाओगे हम अपने घर में कई आफ़्ताब रखते हैं बहुत से लोग कि जो हर्फ़-आशना भी नहीं इसी में ख़ुश हैं कि तेरी किताब रखते हैं ये मय-कदा है वो मस्जिद है वो …

दिलों में आग लबों पर गुलाब रखते हैं
सब अपने चेहरों पे दोहरी नक़ाब रखते हैं

हमें चराग़ समझ कर बुझा न पाओगे
हम अपने घर में कई आफ़्ताब रखते हैं

बहुत से लोग कि जो हर्फ़-आशना भी नहीं
इसी में ख़ुश हैं कि तेरी किताब रखते हैं

ये मय-कदा है वो मस्जिद है वो है बुत-ख़ाना
कहीं भी जाओ फ़रिश्ते हिसाब रखते हैं

हमारे शहर के मंज़र न देख पाएँगे
यहाँ के लोग तो आँखों में ख़्वाब रखते हैं

*राहत इंदौरी*

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