तुम मुझे देख कर मुस्कुराती रहो…

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तुम अगर साथ देने का वा’दा करो मैं यूँही मस्त नग़्मे लुटाता रहूँ तुम मुझे देख कर मुस्कुराती रहो मैं तुम्हें देख कर गीत गाता रहूँ कितने जल्वे फ़ज़ाओं में बिखरे मगर मैं ने अब तक किसी को पुकारा नहीं तुम को देखा तो नज़रें ये कहने लगीं हम को चेहरे से हटना गवारा नहीं …

तुम अगर साथ देने का वा’दा करो
मैं यूँही मस्त नग़्मे लुटाता रहूँ

तुम मुझे देख कर मुस्कुराती रहो
मैं तुम्हें देख कर गीत गाता रहूँ

कितने जल्वे फ़ज़ाओं में बिखरे मगर
मैं ने अब तक किसी को पुकारा नहीं

तुम को देखा तो नज़रें ये कहने लगीं
हम को चेहरे से हटना गवारा नहीं

तुम अगर मेरी नज़रों के आगे रहो
मैं हर इक शय से नज़रें चुराता रहूँ

मैं ने ख़्वाबों में बरसों तराशा जिसे
तुम वही संग-ए-मरमर की तस्वीर हो

तुम न समझो तुम्हारा मुक़द्दर हूँ मैं
मैं समझता हूँ तुम मेरी तक़दीर हो

तुम अगर मुझ को अपना समझने लगो
मैं बहारों की महफ़िल सजाता रहूँ

*साहिर लुधियानवी*