लखनऊ : नहीं होता है इंजेक्शन का इस्तेमाल, आईड्राप से सुन्न कर होती है मोतियाबिंद की सर्जरी, प्रतिष्ठित जरनल में छप चुका है यह शोध
लखनऊ, अमृत विचार । मोतियाबिंद सर्जरी दुनिया भर में की जाने वाली सबसे आम आंख की सर्जरी है। फेकमूल्सीफिकेशन तकनीक के कारण सर्जरी के बाद परिणाम अच्छा आता है, आंखों की दृष्टि अच्छी हो जाती है। लेकिन यदि मोतियाबिंद की सर्जरी फेको विधि के साथ ऑगमेंटेड टॉपिकल एनेस्थिसिया के तहत की जाये तो परिणाम और …
लखनऊ, अमृत विचार । मोतियाबिंद सर्जरी दुनिया भर में की जाने वाली सबसे आम आंख की सर्जरी है। फेकमूल्सीफिकेशन तकनीक के कारण सर्जरी के बाद परिणाम अच्छा आता है, आंखों की दृष्टि अच्छी हो जाती है। लेकिन यदि मोतियाबिंद की सर्जरी फेको विधि के साथ ऑगमेंटेड टॉपिकल एनेस्थिसिया के तहत की जाये तो परिणाम और भी बेहतर होंगे। यह कहना है केजीएमयू के नेत्र विभाग के प्रो.संजीव कुमार गुप्ता का। उन्होंने बताया कि ऑगमेंटेड टॉपिकल एनेस्थीसिया में आंख को केवल आई ड्रॉप का उपयोग करके सुन्न किया जाता हैं,इस प्रक्रिया में आंख के पास कोई इंजेक्शन नहीं लगाया जाता है। यह तकनीक मरीज को इंजेक्शन के दर्द से बचाता है , ऑगमेंटेड टॉपिकल एनेस्थीसिया, इंजेक्शन एनेस्थीसिया (लोकल एनेस्थीसिया) की तुलना में अधिक सुरक्षित है क्योंकि इसमें आंख में चोट लगने या रक्तस्राव होने की कोई संभावना नहीं होती है।
उन्होंने बताया कि ऑगमेंटेड टॉपिकल एनेस्थेसिया मरीज को दर्द रहित अनुभव प्रदान करने में इंजेक्शन एनेस्थीसिया (लोकल एनेस्थीसिया) की तुलना में समान रूप से प्रभावी है जो कई वैज्ञानिक शोध प्रकाशनों द्वारा सिद्ध किया गया है।
केजीएमयू के नेत्र विभाग में इस पर एक शोध भी करीब दो साल पहले हो चुका है। जिसमें दो तुलनात्मक दवाओं, लिग्नोकेन और रोपिवाकाइन के बीच की तुलना उनकी सुरक्षा, प्रभाव और दर्द रहित सर्जरी के लिए की गई थी। अध्ययन से यह निष्कर्ष निकला कि ऑगमेंटेड टॉपिकल एनेस्थेसिया का उपयोग समान रूप से दर्द रहित और प्रभावी है और इसके अलावा रोपाइवाकेन आंख के अंदर के नाजुक ऊतकों (कॉर्नियल एंडोथेलियम) के संरक्षण के संबंध में सुरक्षित था।
यह शोध प्रतिष्ठित इंडियन जर्नल ऑफ ऑप्थल्मोलॉजी में प्रकाशित हुआ है जो ऑल इंडिया ऑप्थेलमिक सोसाइटी की आधिकारिक पत्रिका है।
शोध करने वाली टीम
केजीएमयू के नेत्र विभाग में स्नातकोत्तर छात्रा डॉ. शालिनी सिंह ने प्रो. अरुण शर्मा की देखरेख में यह शोध किया गया था। इसके अलावा इस शोध में केजीएमयू के डॉ. संजीव कुमार गुप्ता, डॉ. विशाल कटियार, डॉ. सिद्धार्थ अग्रवाल और डॉ. संजीव हंसराज (मान सरोवर आई हॉस्पिटल) और डॉ. अजय कुमार (जन कल्याण नेत्र अस्पताल) ने अपना अहम योगदान दिया था।
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