बांदा: मिट्टी की मूरत पर भारी पड़ रहा प्लास्टर ऑफ पेरिस, रोजगार के अभाव में कई परिवारों ने पकड़ी महानगरों की राह
बांदा, अमृत विचार। प्रकाश पर्व दीपावली में दियों के बाद यदि पूजन के लिये कुछ महत्वपूर्ण है तो वह है लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा। एक समय था कि जब बाजार में मिट्टी से तैयार की गई लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं मिला करती थीं, जिससे यहां के कुम्हारों की भी प्रतिमाएं तैयार करने से अच्छी खासी आमदनी हो …
बांदा, अमृत विचार। प्रकाश पर्व दीपावली में दियों के बाद यदि पूजन के लिये कुछ महत्वपूर्ण है तो वह है लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा। एक समय था कि जब बाजार में मिट्टी से तैयार की गई लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं मिला करती थीं, जिससे यहां के कुम्हारों की भी प्रतिमाएं तैयार करने से अच्छी खासी आमदनी हो जाती थी। लेकिन बीते कुछ वर्षों से मिट्टी की मूर्तियों की जगह प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनने वाली प्रतिमाओं ने ले ली है, जिसकी वजह से मिट्टी की प्रतिमा तैयार करने वाले कुम्हारों के हाथ खाली हो गये हैं।
शहर में तकरीबन एक सैकड़ा ऐसे परिवार मर्दननाका मोहल्ले में रहते हैं, जो एक लंबे समय से मिट्टी के दियों के साथ ही लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं बनाकर उन्हें आकर्षक रंगों से रंगकर तैयार करते आये हैं, क्योंकि उस समय मार्केट में सिर्फ मिट्टी की प्रतिमाओं की ही मांग थी। इसका एक कारण यह भी है कि वैदिक शास्त्र के अनुसार मिट्टी से बनी प्रतिमा पूजन के लिये शुभ मानी जाती है। तकरीबन दो दशक पहले रबर के मोल्डिंग (सांचे) से तैयार होने वाली प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियां बाजार में आईं, तो लोगों ने वैदिक रीति-रिवाज को विस्मृत करते हुए इन्हें तवज्जो देना शुरू कर दिया।
वजह सिर्फ एक है कि प्लास्टर ऑफ पेरिस से तैयार होने वाली प्रतिमाओं में नाक-नक्श उभरकर आते हैं और फिनशिंग बेहतर होने के कारण इनमें रंग और चमक अलग ही दिखाई देती है, जबकि मिट्टी टाइट होने के कारण सांचे में उस तरह से नहीं ढल पाती, जिससे कि नाक-नक्श को बारीकी से उभारा जा सके। प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों के आगे मिट्टी की प्रतिमाएं बाजार में नहीं ठहर पाईं और इस व्यापार को ग्रहण लग गया, जिससे मिट्टी से प्रतिमाएं गढ़ने वाले कुम्हारों ने भी इस काम को छोड़ दिया और अपने बच्चों का पेट पालने को देश के महानगरों में मजदूरी करने को परिवार समेत पलायन कर लिया।
जमकर बिक रही मिट्टी से बनी ग्वालिन
लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाओं के साथ बुंदेलखंड में मिट्टी से बनी ग्वालिन की भी प्रकाश पर्व पर पूजा शुभ मानी जाती है। दीपावली पर सैकड़ों की तादाद में ग्वालिन तैयार करते हैं, जो हाथोंहाथ बिक जाती हैं। ग्वालिन की प्रतिमा में दोनों हाथ व सिर पर तीन दिये रखने को जगह बनाई जाती है। इस बार ग्वालिन का जोड़ा सौ रुपये में बिक रहा है।
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