रामपुर: ‘रजा लाइब्रेरी में विद्वानों ने पलटे इतिहास के पन्ने’

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रामपुर, अमृत विचार। रजा लाइब्रेरी में शारेह रूमी और इकबाल-मौलाना अब्दुस्सलाम खां विषय पर तृतीय स्मृति व्याख्यान हुआ। इस अवसर पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जन संचार विभाग के प्रो. शाफे किदवई ने मौलाना रूम और अल्लामा इकबाल पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन, मौलाना अब्दुस्सलाम ने इन दोनों के रचनात्मक कारनामों और विचारों …

रामपुर, अमृत विचार। रजा लाइब्रेरी में शारेह रूमी और इकबाल-मौलाना अब्दुस्सलाम खां विषय पर तृतीय स्मृति व्याख्यान हुआ। इस अवसर पर अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जन संचार विभाग के प्रो. शाफे किदवई ने मौलाना रूम और अल्लामा इकबाल पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। लेकिन, मौलाना अब्दुस्सलाम ने इन दोनों के रचनात्मक कारनामों और विचारों को अशआर में जोड़कर उनको समझाने की नई पृष्ठभूमि बनाई। मौलाना रूम और इकबाल हमारी सामूहिक संस्कृति और साहित्यिक जीवन के एक ऐसे निशान हैं जिनकी रोशनी हमेशा कायम रहेगी।

लाइब्रेरी के रंग महल में रविवार को आयोजित कार्यक्रम का आगाज डा. अनवारुल हसन कादरी ने कुरआन मजीद से किया और मोहम्मद जफर खां और जीशान अफसर ने नाते पाक पेश की। इस मौके पर प्रो. शाफे किदवई ने कहा कि मौलाना अब्दुस्सलाम ने मौलाना रूम और अल्लामा इकबाल की रचनात्मक विशेषज्ञता और अकादमिक उल्लेख को अत्यंत स्पष्टता के साथ समझाया है। उनकी किताबें अफकारे-रूमी और अफकारे इकबाल उनकी गहरी इल्मी नजरिए का हिस्सा हैं।

रजा लाइब्रेरी बोर्ड के सदस्य प्रो. अब्दुल अली ने कहा कि इकबाल और रूमी के ख्यालात में बहुत समानता हैं। इकबाल की खुदी का फलसफा दूसरे से बिल्कुल अलग है। जब तक उर्दू, अरबी, फारसी नहीं जानेंगे तक रूमी और इकबाल को समझना आसान नहीं है। मौलाना अब्दुस्सलाम अरबी, उर्दू, फारसी और फलसफे के माहिर थे।

जामिया मिल्लिया इस्लामिया नई दिल्ली के इस्लामिक अध्ययन विभाग के प्रो. इक्तेदार मोहम्मद खां ने कहा कि मुझे इस बात पर गर्व है कि मौलाना की शख्सियत हिन्दुस्तान तक ही सीमित नहीं है। बल्कि दुनिया में अपनी कौम के फलसफे के मैदान में आखिरी सहभागी की हैसियत से मौलाना अब्दुस्सलाम को भुलाया नहीं जा सकता। संचालन साजिदा शेरवानी ने किया। डा. अबुसाद इस्लाही ने सभी का आभार जताया।

इन्होंने भी किए विचार व्यक्त
नासिर उद्दीन खां, डा. मुमताज अर्शी, सैयद फरीद, डा. अब्दुस्सलाम

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