बरेली: जिंक और कैडमियम ने बदल दिया मछलियों के तैरने का तरीका

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Edited By Amrit Vichar
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बरेली कॉलेज के जंतु विज्ञान की पीएचडी छात्रा नेहा की ओर से कछला घाट पर गंगा नदी में किया अध्ययन

बरेली, अमृत विचार बीते कुछ वर्षों से नदियों में प्लास्टिक की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है। इससे सबसे अधिक प्रभावित जलीय जीव और मछलियां हो रही हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार नदी और समुद्र में ऐसे ही प्लास्टिक व प्रदूषण का स्तर बढ़ता रहा तो मछलियों के शरीर में भी प्लास्टिक समेत अन्य पदार्थों की मात्रा खतरनाक स्तर तक बढ़ जाएगी। पानी में जिंक व कैडमियम नामक भारी धातुओं की अधिकता से मछलियों के तैरने पर प्रभाव पड़ने को लेकर अध्ययन किया गया।

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बरेली कॉलेज की पीएचडी छात्रा नेहा की ओर से अध्ययन में पता चला है कि जिंक व कैडमियम से मछलियों के तैरने के पैटर्न में बदलाव देखने को मिला है। इसकी मात्रा निर्धारित से अधिक होने पर मछलियों की तैरने की रफ्तार में तेजी देखने को मिली है, जिससे उनके शरीर पर मौजूद स्केल्स (त्वचा पर मौजूद शल्क) गिरने लगते हैं। जिससे वह शारीरिक तापमान में बदलाव होने से प्रभावित होती है।

बदायूं की रहने वाली पीएचडी छात्रा नेहा ने बताया कि उन्हें जल संसाधनों के विषय पर अपनी पीएचडी के लिए रिसर्च प्रोजेक्ट पर काम करना था। डा. बीनम सक्सेना के निर्देशन में उन्होंने बायोकेमिकल एंड हिस्टोपैथोलॉजिकल बायोमैकर्स इन एडिबिल फिश ऑफ कछला घाट, गंगा रिवर नामक विषय पर अध्ययन करना शुरू किया। लगभग पांच वर्ष की थिसिस के दौरान उन्होंने विभिन्न जलवायु परिस्थिति के अनुसार कछला नदी के पानी व मछलियों के सैंपलों पर अध्ययन किया।

नदी के पानी पर शोध के लिए उन्होंने बसंत ऋतु, ग्रीष्म ऋतु, वर्षा ऋतु, शरद ऋतु, हेमंत ऋतु व शिशिर ऋतु में पानी का सैंपल लिया। जिसमें भारी धातुएं जिंक व कैडमियम की अधिक मात्रा पर अध्ययन किया। नेहा के अनुसार गंगा में बढ़ते प्रदूषण, मछलियों व अन्य जलीय जीव-जंतुओं पर हो रहे प्रतिकूल प्रभावों को रोकने के लिए आमजन का जागरूक होना आवश्यक है।

रोहू मछलियों पर किया अध्ययन
मछलियों पर जिंक व कैडमियम पर प्रभाव देखने के लिए नेहा ने रोहू मछलियों पर अध्ययन शुरू किया। इसके लिए लैब में चार टैंक में लगभग 10 रोहू मछलियों को रखा गया। बाहरी रूप से निर्धारित से थोड़ी सी अधिक मात्रा में रोहू पर जिंक व कैडमियम की मात्रा देने पर उसके प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिले हैं। इन प्रतिकूल प्रभावों में मछलियों के शरीर में बर्निंग सेन्सेशन, त्वचा संबंधित समस्याएं, तैरने का पैटर्न, हाइपर एक्टिविटी, आंखों में लालपन, त्वचा से खून निकलना जैसी समस्याएं देखने को मिली।

नमामि गंगे प्रोजेक्ट के दौरान दिखाई दिए सुधार
केंद्र सरकार की ओर से नमामि गंगे प्रोजेक्ट पर कुछ सुधार दिखाई दिए। उनके अनुसार वर्ष 2016 में पानी के सैंपल में प्रदूषण की मात्रा अधिक थी। जबकि वर्ष 2019 में बदायूं क्षेत्र में इसके सकारात्मक परिणाम दिखाई दिए। वहीं, पानी के अलग-अलग परिस्थिति के सैंपलों के लिए घाट पर लगने वाले मेले से पहले व मेले के बाद के सैंपलों पर अध्ययन किया गया। जिसमें मेले के बाद लिए हुए सैंपलों में निर्धारित मात्रा बहुत अधिक पाई गई।

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