मां से बिछड़ी नन्हीं शावक बनी Kanpur Zoo की प्यारी लुना, पूर्णिमा के दिन पीलीभीत के जंगल में की गई थी रेस्क्यू

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कानपुर चिड़ियाघर में नन्हीं शावक को दस दिन के लिए क्वारंटाइन किया गया है।

कानपुर चिड़ियाघर में मां से बिछड़ी नन्हीं शावक प्यारी लुना बनी है। पूर्णिमा के दिन पीलीभीत के जंगल से रेस्क्यू की गई थी। इसलिए चांद का पर्यावाची नाम दिया गया है।

कानपुर, अमृत विचार। मां से बिछड़ी नन्हीं शावक को चिड़ियाघर में लुना नाम रखा गया है। पूर्णिमा के दिन रेस्क्यू किए जाने की वजह से उसे चांद का पर्यावाची नाम दिया गया है। लुना को 10 दिन के क्वारंटाइन में हॉस्पिटल के बाड़े में ही रखा जाएगा। अब उसे स्टाफ का दुलार मिलेगा और उसके खाने और पीने का पूरा ख्याल रखा जाएगा। जल्द ही नौ टाइगर के बीच में यह नन्हीं शावक जू पर्यटकों को अटखेलियों से रोमांच भर देगी।

पीलीभीत के पूरनपुर क्षेत्र में खारजा नहर की झाड़ियों से मादा नन्हीं शावक को रेस्क्यू कर पकड़ा गया था। चिड़ियाघर के उप निदेशक व पशु चिकित्सक डॉ. अनुराग सिंह ने बताया कि वहीं के गांव उदय करनपुर के प्रधान ने बाघ की मौजूदगी का आभास किया था। जिसके बाद गांव वाले भी घबरा गए थे।

उसके बाद प्रधान ने ही इस नन्हीं बाघिन की मौजूदगी का एक वीडियो बनाकर वन विभाग के अधिकारियों को भेजा था। उसके बाद वन विभाग और डब्ल्यूआईटी ने शावक की मां को खोजने के लिए वहां कैमरे भी लगाए, दस दिन तक इंतजार किया। जब कोई बाघिन नहीं आई तो फिर टीम ने रेस्क्यू कर उसे गढ़ा गेस्टहाउस लाया गया।

वहां से आठ दिसंबर की रात कानपुर चिड़ियाघर लेकर आए। यहां शुक्रवार को सुबह साढ़े दस बजे उसे क्वारंटाइन कर दिया गया। डॉ. अनुराग ने बताया कि पूर्णिमा के दिन रेस्क्यू किए जाने पर उसका लुना नाम रखा गया है। स्वस्थ होने के बाद वह दर्शकों के बीच भी लाई जाएगी, नन्हीं शावक की रोमांचकारी हरकतें पर्यटकों को खूब आकर्षित करेंगी।

शिकारी नहीं बन पाएगी लुना

अपने बच्चों को शिकारी बनाने की जिम्मेदारी मादा बाघ की होती है। डॉ. अनुराग बताते हैं कि लुना के पंजे, दांत सभी स्वस्थ हालत में हैं, लेकिन अभी वह बेहद कमजोर है। उसे शिकार करना बिल्कुल नहीं आता। बाघिन ही उसे यह हुनर सिखाती है। चिड़ियाघर में पलने के बाद वह जंगल में जाने की स्थिति में नहीं रहेगी। उसका स्वभाविक नेचर बदल जाएगा। हालांकि बड़ी होने के बाद उसे चिड़ियाघर में ही रखना है या फिर जंगल में, इसको लेकर उच्चाधिकारियों द्वारा फैसला लिया जाएगा।

अंधेरे में निकलती थी और फिर छिप जाती थी

डॉ. अनुराग बताते हैं कि छोटी उम्र, कमजोर और मां से बिछड़ जाने की वजह से शावक बेहद डरने लगा था। इसलिए वह एक मृत जानवर के मास को खाने के लिए अंधेरे में झाड़ियों से निकलता था और फिर वहीं छिप जाता था। खारजा नहर में भी पानी पीने वह अंधेरा होने पर ही जाता था।

…जू में मिला मुर्गे का कीमा

डॉ. अनुराग बताते हैं कि नन्हीं शावक को देखकर माना जा रहा है कि इसे कई दिनों से पर्याप्त आहार नहीं मिला। जिस मृत पशु के पास आकर वह भूख मिटाती थी, वन विभाग ने बताया कि उसमें भी खाने को कुछ बचा नहीं था। जू में पहले दिन उसे दो किलोग्राम मुर्गे का कोरमा दिया गया। अभी उसे नरम मीट ही दिया जाएगा, जिससे उसे पचाने में परेशानी न हो।

मां से बिछड़ी या बाघिन ने छोड़ा?

वन विभाग के विशेषज्ञ यह भी पता लगा रहे हैं कि आखिरकार बाघिन से लुना बिछड़ी है या फिर मां ने उसे छोड़ दिया। दरअसल बाघिन के स्वभाव को देखते हुए नन्हें शावक के अकेले होने की वजह दोनों में कुछ भी हो सकती है।

जू के पशु चिकित्सक डॉ. नितेश कटियार बताते हैं कि कई बार कमजोर और सुस्त बच्चे के जन्म लेने पर भी बाघिन अपना दूध पिलाना बंद करे देती है, कई बार उसे खाने जैसी घटनाएं भी होती हैं और इस स्थिति में शाव को बाघिन छोड़ भी देती है। माना जाता है कि बाघिन कमजोर शावक को पसंद नहीं करती। मां से बिछड़ने की वजह स्पष्ट नहीं है।

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