बायो-इथेनॉल ईंधन के लिए काष्ठीय बायोमास को विखंडित करने वाली एंजाइम का किया गया अध्ययन

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नई दिल्ली। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी और लिस्बन विश्वविद्यालय, पुर्तगाल के शोधार्थियों ने सामान्य शर्करा में काष्ठीय जैव पदार्थ को विखंडित करने में एक विशेष एंजाइम की प्रभावकारिता का अध्ययन किया है। इस प्रक्रिया के जरिये बायो-इथेनॉल तैयार किया जा सकता है, जो एक नवीकरणीय ईंधन है और पेट्रोलियम आधारित ईंधन प्रणालियों की जगह ले सकता है।

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यह शोध इंटरनेशनल जर्नल ऑफ बायोलॉजिकल मैक्रोमोलेक्युल्स में प्रकाशित हुआ है। अधिकारियों के मुताबिक, घटते जीवाश्म ईंधनों और उनके दोहन से जुड़े पर्यावरणीय प्रभाव की समस्याओं के मद्देनजर नवीकरणीय जैव स्रोतों से पैदा किये गये ईंधन में हाल के वर्षों में वैज्ञानिक की रूचि काफी बढ़ी है।

आईआईटी गुवाहाटी के बायोसाइंस और बायोइंजीनियरिंग विभाग के अरूण गोयल ने कहा, ‘‘कई ज्ञात जैवईंधन में, इथेनॉल (इथाइल अल्कोहल) का पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव को लेकर व्यापक अध्ययन किया जाता है। स्पिरिट के रूप में और पेय पदार्थ के रूप में इस्तेमाल की जानी वाली यह चीज शर्करा और स्टार्च वाले कच्चे पदार्थों (अंगूर, जौ, आलू आदि) से तैयार की जाती है। ’’

आईआईटी गुवाहाटी में पीएचडी छात्र परमेश्वर गवांडे ने कहा,‘‘सेल्युलोज को विखंडित करने की क्षमता इसे वस्त्र, भोजन और लुग्दी उद्योग, प्रीबायोटिक्स और फार्मास्यूटिकल्स जैसे क्षेत्रों में उपयोगी बना सकती है।’’

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