सरदार भगत सिंह के कनपुरिया साथी बटुकेश्वर दत्त 

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अनूप शुक्ल/ महामंत्री/कानपुर इतिहासकार समिति/ बटुकेश्वरदत्त का जन्मस्थान कानपुर ही है। उनके पिता श्री गुष्टो बाबू (गोष्ठ बिहारी दत्त) कुरसवाँ मे रहते थे और डा. गंगोली के दवाखाने के मैनेजर थे। ( जिनके बारे मे प्रसिद्ध था कि ~~ डा. महेन्द्रनाथ गंगोली सड़क ठंडी पर रहते है, चले आओ मरीजों गर तुम अपनी शफा चाहो )  बटुकेश्वर दत्त की प्रारम्भिक शिक्षा करांचीखाना के आदर्श बंग विद्यालय मे हुई थी। इस विद्यालय के प्रधानाध्यापक ब्रह्मचारी नैपालेश्वर जी स्थानीय रामकृष्ण आश्रम के भी संचालक थे उनके प्रभाव से श्री दत्त आश्रमके एक प्रमुख सदस्य बन गये। श्री दत्त को प्रताप के सब एडीटर श्री जगमोहन  विकसित ने थियोसाफिकल हाईस्कूल मे छोटी क्लास मे पढ़ाया था। बटुकेश्वरदत्त ने उच्च शिक्षा पीपी एन कालेज से प्राप्त की थी। 20

यह सन 1922-23 की बात है, जब देश का वातावरण राजनैतिक आन्दोलन से उत्तेजनापूर्ण हो रहा था कि श्री दत्त का ध्यान इस ओर झुका और वे श्री सुरेशचन्द्र भट्टाचार्य के घर आने जाने लगे जोकि क्रान्तिकारियों का अड्डा था। इससे उनकी रुचि क्रान्तिकारी आन्दोलन की तरफ बढ़ने लगी। कुछ समय बाद सरदार भगत सिंह भी सुरेश बाबू के मकान में रहने लगे और यही से श्री बटुकेश्वरदत्त की भगत सिंह व चन्द्रशेखर आजाद से घनिष्ठ मित्रता हो गई, जो दिन पर दिन बढ़ती गई। 

श्री दत्त हिन्दुस्तानी सोशियोलिस्ट रिपब्लिकन एसोशिएसन के सदस्य बन कर क्रान्तिकारियों के साथ काम करने लगे। काकोरी केस में श्री सुरेश बाबू तथा कानपुर के अन्य क्रान्तिकारी गिरफ्तार हो जाने के बाद पुलिस श्री दत्त के पीछे पड़ गई।
श्री बटुकेश्वर दत्त जी सरदार भगत सिंह के पास जा पहुँचे। लाहौर षडयंत्र केस मे चर्चित हुए। केन्द्रीय विथानसभा (वर्तमान संसद भवन)  8 अप्रैल 1929 को दो बमों के साथ भगत सिंह व बटुकेश्वर दत्त गये उस दिन भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों का दमन करने वाला पब्लिक सेफ्टी विल पेश होना था। जैसे ही विल पेश हुआ दो धमाके हुए और इन्कलाब जिन्दाबाद व साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के नारे के साथ कुछ लाल पर्चे विरोध मे दर्शक दीर्घा से फेक कर श्री दत्त व भगतसिंह ने विरोध प्रकट किया। बम विस्फोट से केन्द्रीय असेम्बली मे धुआ भर गया, जार्ज सस्टर व बी दलाल घायल हुए, बम खाली बेन्च पर गिरने से और अधिक नुकशान नहीं हुआ। बम विस्फोट व पर्चे फेंक कर ब्रिट्रिश सत्ता का विरोध कर उसकी चूले क्रान्तिकारियों ने हिला दी थी।

भगत सिंह व अन्य साथियों को फांसी की सजा के. साथ श्री बटुकेश्वर दत्त को आजीवन कारावास की सजा देकर कालापानी भेज दिया गया। फांसी न होने पर निराश श्री दत्त ने भगत सिंह को पत्र लिखा कि - वतन पर शहीद होना ज्यादा फख्र की बात हैं, भगत सिंह ने उत्तर दिया- वे दुनियां को दिखाये कि क्रान्तिकारी अपने आदर्शो के लिए मर ही नहीं सकते बल्कि जीवित रहकर जेलों की अन्धेरी कोठरियों में हर तरह की यातना भी सहन कर सखते है। श्री दत्त ने जेल जीवन मे कई ऐतिहासिक भूख हड़ताले भी की | 1937 में सेल्युर जेल से बाकीपुर केन्द्रीय कारागार लाया गया और 1938 में रिहा हुए लेकिन ज्यादा समय बाहर न रह सके और फिर जेल भेज दिए गये और 1945 में मुक्त हुए। 

आजादी के बाद श्री दत्त ने अंजली दत्ता से विवाह कर पटना में रहने लगे। जीवनयापन के लिए काफी संघर्ष किया सिगरेट कंपनी के एजेन्ट, टूरिस्ट गाइड, ब्रेड व बिस्किठ का कारखाना , और पटना मे बस संचालन का परमिट तक माँगा। 1963 में उन्हे बिहार विधान परिषद का सदस्य बनाया गया। 200 जुलाई 1965  को नई दिल्ली मे अखिल भारतीय आयुर्विग्यान संस्थान में मृत्यु हो गई। उनकी इच्छा के अनुसार उन्हे फिरोजपुर हुसैनीबाला मे सरदार भगतसिंह, सुखदेव व राजगुरु आदि साथियों की समाधि  के पास अन्तिम संस्कार किया गया। 

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